Naxalism in Punjab

कभी पंजाब में भी जोर रहा था

नक्सलवाद का

चंडीगढ़-आज बिहार, छत्ताीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में चाहे नक्सलवाद पूरा फल-फूल रहा हो मगर एक दौर ऐसा भी रहा है जब पंजाब इससे अछूता नहीं रहा था। हालांकि अब पंजाब में यह मुहिम मद्धिम पड़ चुकी है मगर पुलिस का मानना है कि अभी भी यह अंदरखाते सुलग रही है। एक अनुमान के मुताबिक आज करीब हर गांव में नक्सलवादियों के हितैषी हैं ही चाहे वह दो-चार ही क्यों न हों।

आजादी के करीब डेढ़ दशक बाद बड़े जमीदारों की जमीनें ताकत के बल पर लूटने और उसे गरीब भूमिहीन मजदूरों में बांटने के लिए नक्सलवादी मुहिम छेड़ी गई थी। तब इस मुहिम का कोई खास नाम नहीं था मगर बाद में इस मुहिम का नाम पड़ा नक्सलवादी मुहिम।

इसके पीछे की कहानी भी कम रोचक नहीं है। इस शब्द का हालांकि कोई अर्थ नहीं है मगर अपने पीछे एक बड़ा राज और अर्थ यह छुपाए हुए है।

दरअसल पश्चिम बंगाल के दार्जलिंग जिले के गांव नक्सलबाड़ी में सबसे पहले 1967 में इस मुहिम का कोई नतीजा इस गर्मपंथी जमात के हक में निकला था। यह मुहिम अंदरखाते 50-60 के दशक से चल रही थी मगर 1967 आते-आते यह अपना रंग पकड़ चुकी थी।

भूमिहीन किसानों ने हथियारों के बल पर जमींदारों से जमीनें छीनकर बांट ली थी। यह लोग सीपीएम के कार्यकर्ता थे।

कानू सान्याल इस मुहिम के भारत में जनक रहे हैं, इस मुहिम की शुरूआत वैसे चीन में हुई थी। नक्सलबाडी गांव में पुलिस से भिडंत के बावजूद इन्होंने जमीन से कब्जा नहीं छोडा था हालांकि कुछ लोग इस कार्रवाई में मारे गए थे।

सीपीएम ने इन्हें पार्टी से निकाल दिया था और बाद में यह लोग कानू सान्याल समेत अंडरग्राउंड हो गए थे। सान्याल समेत उस समय सीपीएम के एक बडे नेता चारू मजूमदार भी सीपीएम से अलग हो गए थे और इन्होंने सीपीएम-एमएल खडी की। इसका मकसद था देशभर में अपनी ताकत और हथियारों के बल पर जमीनें छीन कर आपस में बांटना।

हालांकि इस मुहिम का असर पूरे देश में हुआ था मगर पंजाब में इसका उसी समय बड़ा असर देखने को मिला।

एक स्वतंत्रता सेनानी बुझा सिंह इसके पंजाब में मुखिया थे जिनकी उम्र उस समय करीब अस्सी साल थी। उनके नेतृत्व में यहां भी सीपीएम-एमएल ने प्रोपेगंडा शुरू किया।

उस दौर में बादल पहली बार पंजाब के मुख्यमंत्री बने थे। उनके आदेश पर पंजाब भर में करीब 150 नक्सलवादी मारे गए थे। पंजाब में तब डीजीपी का पद नहीं था बल्कि पूरी पुलिस आईजी भगवान सिंह दानेवालिया के अंडर थी। यह नक्सलवादी फर्जी मुठभेडों में मारे गए थे और इनमें से अधिकांश कालेज के युवा छात्र थे।

इस मुहिम की बठिंडा और रोपड में सबसे तेज शुरूआत हुई। पटियाला में एक डीएसपी मारा गया, चमकौर साहिब में थाने पर हमला हुआ।

पंजाब से नामी कवि पाश, नाटककार गुरशरण सिंह, सिख इतिहासकार अजमेर सिंह आदि खुलकर इसका समर्थन करते थे। गुरशरण सिंह ने कालेजों में जा-जा कर मुहिम के समर्थन में नाटक खेले। लुधियाना से निकलने वाली हेमज्योति पत्रिका भी इस मुहिम का एक प्रकार से मुखपत्र बन गई थी। लुधियाना का कृषि विश्वविद्यालय, इंजीनियरिंग कालेज, जालंधर का खालसा कालेज इस मुहिम में नक्सलवादी मुहिम के कर्ता-धर्ता बने लोगों के अडडे बने थे।

1971 तक यह मुहिम हिंसक रही मगर बाद में इसमें धडेबंदी उभरने लगी। एक धडा नरम पंथियों का था जिसका कहना था कि हमलों की बजाय जागरूक करने वाली सक्रिय मूवमेंट चलाई जाए। आंध्र प्रदेश के सांसद टी नागारेड्डी भी हमलों के विरोधी थे। बाद में मार-काट का विरोध करने वाला ग्रुप ज्यादा हावी हुआ।

इस कड़ी में एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि अकाली दल के पूर्व मंत्री तोता सिंह उस समय नक्सलवादियों की हिट लिस्ट पर थे जबकि मौजूदा अकाली मंत्री सुच्चा सिंह लंगाह गुरदासपुर जिले में पंजाब स्टूडेंट यूनियन के महासचिव होने के चलते इस मूवमेंट में बढ़-चढ़ कर भाग लेते थे।

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