Paash’s friends remember him

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_4289717_1.html

बचपन से ही विद्रोही स्वभाव के थे पाश

Mar 23, 11:41 pm
इबलीस, कपूरथला कुछ राहें ऐसी होती हैं, जिन की मिट्टी उठा कर माथे पर लगाने को दिल करता है और कुछ राहें ऐसी होती हैं, जिन पर चलता तो दूर, उन को देख कर दिल से बद्दुआ सी निकलती है। ऐसी ही दो राहों से घिरे हैं, लोक कवि शहीद पाश के खेत। कपूरथला के कस्बा काला संघियां-नकोदर मार्ग पर बसे गांव तलवंडी सलेम से मात्र कुछ मीटर की दूरी पर स्थित इन खेतों को जाने वाली मुख्य राह ऐसी है, जिसने वर्षो इस क्रांतिकारी कवि के कदमों को चूमा। वहीं पास में उगे सफेदे के वृक्षों के पास से गुजरने वाली पगडंडी इसलिए शर्मसार सी नजर आती है, क्योंकि उसे पाश की शहादत के लिए जिम्मेवार लोगों का रास्ता बन जाने का धिक्कार है। इन खेतों में खड़ा आम का वृक्ष एक मात्र ऐसा गवाह है, जिसने इस शहादत को देखा, परंतु वह इसलिए सिर झुकाए खड़ा है, क्योंकि उसकी जड़ता इस घटना को बयान करने के आड़े आई थी। इन खेतों की मिट्टी आज इस रंजोगम में डूबी नजर आ रही है कि फसलों को पसीने से सींचने वाले अपने मालिक पाश के खून का स्वाद उसे जबरन चखाया गया। पाश के सीने में लगनी वाली गोली तो शर्मसार हो सकती है, परंतु उनके गांव निवासी व साहित्यिक मित्र उनके नाम पर गर्व महसूस करते हैं। उनके चचेरे भाई व प्रेरणा स्रोत शायर संत संधु के अनुसार पाश बचपन से ही विद्रोही स्वभाव का थे और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध थे। वे कोठियों में बैठ कर क्रांति की बातों में यकीन न रख कर कर्म में यकीन रखते थे। प्रख्यात शायर सुरजीत पातर के अनुसार नक्सलबाड़ी लहर के दौरान पाश अक्सर उनके पास लुधियाना आ कर ठहरा करते थे। उन्होंने कहा कि पाश की कविता तो बहुत पढ़ी सुनी गई है, परंतु उनकी कविता के कलात्मक पक्ष अभी भी नजरंदाज हैं। पाश के चचेरे भाई सुच्चा सिंह के अनुसार उन्होंने अपनी रूपोशी के दिनों में सांकेतिक भाषा भी ईजाद की थी। पाश के बचपन के मित्र व शायर संतोख कुलार के अनुसार पाश से उनकी अंतिम भेंट उनकी शहादत से एक सप्ताह पूर्व हुई थी और वे देर रात तक उनके साथ रहे व खूब हंसी-मजाक का दौर चला था। उन्होंने बताया कि पाश जहां खूबसूरत कविता लिखते थे, वहीं बुलंद आवाज के भी मालिक थे। शायर कंवर इम्तियाज ने बताया कि पाश की शहादत के दिन वह उनके खेतों में गए थे और उनके खेतों में उगे आम के वृक्ष के पत्ते व मिट्टी अपने साथ लाए थे, जो आज भी उनके पास महफूज है और उनकी मुलाकातों की याद दिलाती रहती है।

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