In Memory of Paash (23.03.09)

जीवन के प्रति बेहद आशावान पाश की कविताएं   
 
 
[पाश की पुण्यतिथि 23 मार्च पर विशेष] नई दिल्ली। कहने को तो पाश पंजाबी के कवि थे लेकिन उन्होंने अपने विशिष्ट तेवर और सर्वथा नए बिंब तथा भाषा वाली कविता के कारण भारतीय साहित्य में अपना अनूठा स्थान बना लिया। उनकी कविताएं समाज के तमाम खतरों को सशक्त ढंग से पेश करने के बावजूद जीवन के प्रति बेहद आशावान नजर आती हैं। पाश को पंजाबी की शीर्ष पंक्ति का कवि करार देते हुए राजधानी के खालसा कालेज में पंजाबी भाषा की प्राध्यापिका डा. विनीता ने कहा कि उन्होंने अपने तेवरों की वजह से न केवल हिन्दुस्तानी बल्कि विदेशी भाषाओं में भी काफी लोकप्रियता पाई है। पंजाबी में उन्हें जुझारू या खाडकू कवि कहा जाता है। उन्होंने कहा कि पाश ने पंजाबी भाषा में प्रगतिवाद को नई दिशा दी। उनकी कविता कम्युनिस्ट आंदोलन से जुडी होने के कारण आम समाज को बेहद प्रभावित करती है। डा. विनीता ने कहा कि पाश की कविता में स्पेन के प्रसिद्ध क्रांतिकारी कवि लोर्का और नोबेल पुरस्कार प्राप्त पाब्लो नेरूदा की कविताओं की तरह ऐसे तत्व थे जो दुनिया के हर समाज को झकझोर देने में सक्षम हैं। उनके बिंब बेहद प्रभावी होते थे। पाश की भाषा शैली का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी कविताओं की भाषा बेहद सरल होने के बावजूद काफी धारदार होती है और आक्रामक शैली न केवल आपको आकर्षित करती है बल्कि लंबे समय तक आपको सोचने को विवश कर देती है। राजधानी के दयाल सिंह कालेज में पंजाबी के प्राध्यापक रविन्द्र सिंह ने कहा कि पाश की जुझारू कविताएं समाज के कामकाजी वर्ग, विशेषकर किसानों की समस्याओं को लेकर लिखी गई थीं। ये कविताएं जमीन से जुडी होने के कारण काफी असर छोडती हैं। उन्होंने कहा कि पाश ने अपनी कविताओं में बिल्कुल नई भाषा ईजाद की। यह भाषा बहुत सरल होने के बावजूद काफी असरदार है। इसे यदि लोकभाषा कहा जाए तो गलत नहीं होगा। सिंह ने कहा कि पाश की इंकलाबी कविताओं का पंजाबी की अगली पीढी पर काफी असर दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि यह प्रभाव खासकर कनेडियाई कविताओं में दिखाई देता है। कनाडा में बसा पंजाबियों का एक वर्ग पाश की कविताओं से प्रभावित होकर इंकलाबी कविताएं रच रहा है। पाश लोहा शीर्षक की अपनी कविता में वर्ग भेद को बेहद तीखे अंदाज में स्पष्ट करते हैं.. आप लोहे की कार का आनंद लेते हो, मेरे पास लोहे की बंदूक है मैंने लोहा खाया है आप लोहे की बात करते हैं। समाज में फासीवादी प्रवृतियों पर कडी चोट करती उनकी यह पंक्तियां किसी को भी झकझोरने के लिए पर्याप्त हैं..। सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना न होना तडप का सब सहन कर जाना घर से निकलना काम पर और काम से लौट कर घर जाना सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना। पंजाब में जालंधर के तलवंडी सलेम गांव में नौ सितंबर 1950 को जन्मे पाश का मूल नाम अवतार सिंह संधु था। उन्होंने महज 15 साल की उम्र से ही कविता लिखनी शुरू कर दी और उनकी कविताओं का पहला प्रकाशन 1967 में हुआ। उन्होंने सिआड, हेम ज्योति और हस्तलिखित हाक पत्रिका का संपादन किया। पाश 1985 में अमेरिका चले गए। उन्होंने वहां एंटी 47 पत्रिका का संपादन किया। पाश ने इस पत्रिका के जरिए खालिस्तानी आंदोलन के खिलाफ सशक्त प्रचार अभियान छेडा। पाश कविता के शुरुआती दौर से ही भाकपा से जुड गए। उनकी नक्सलवादी राजनीति से भी सहानुभूति थी। पंजाबी में उनके चार कविता संग्रह.. लौह कथा, उड्डदे बाजां मगर, साडे समियां विच और लडांगे साथी प्रकाशित हुए हैं। हिन्दी में इनके काव्य संग्रह बीच का रास्ता नहीं होता और समय ओ भाई समय के नाम से अनूदित हुए हैं। पंजाबी के इस महान कवि की महज 39 साल की उम्र में 23 मार्च 1988 को उनके ही गांव में खालिस्तानी आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। पाश धार्मिक संकीर्णता के कट्टर विरोधी थे। धर्म आधारित आतंकवाद के खतरों को उन्होंने अपनी एक कविता में बेहद धारदार शब्दों में लिखा है- मेरा एक ही बेटा है धर्मगुरु वैसे अगर सात भी होते वे तुम्हारा कुछ नहीं कर सकते थे तेरे बारूद में ईश्वरीय सुगंध है तेरा बारूद रातों को रौनक बांटता है तेरा बारूद रास्ता भटकों को दिशा देता है मैं तुम्हारी आस्तिक गोलियों को अ‌र्ध्य दिया करूंगा..।

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