Paash Memorial Function in Talwandi Salem on 23rd March 2010

पौ फटते ही फिजा में घुल गए पाश के नग्मे

देसराज काली

तलवंडी सलेम (जालंधर). जालंधर से 26 किमी. दूर गांव तलवंडी सलेम की उदास सुबह। सूर्य की पहली किरण अडोल खड़े उस आम के वृक्ष पर पड़ी, जो पाश और उनके साथी हंस राज की शहादत की गवाही के तौर पर अब भी खड़ा है। जिस तख्तपोश पर उस समय वे बैठे थे, उसका चेहरा पूर्व की ओर से हटाकर पश्चिम की तरफ कर दिया गया है।

मुर्ग़े की बांग के साथ ही वो सारा दृश्य साकार हो गया, जिसे हम पाश की कविताओं में महसूस करते रहे हैं। सुबह के छह बजने तक गांव की ओर से स्पीकर की ऊंची आवाÊा में पाश के नग्मे बजने लगे। मैं उस जगह से, जहां पाश शहीद हुए थे, गांव की तरफ़ चल पड़ा। 23 मार्च के इन शहीदों की याद में बने हॉल में कुछ नौजवान पंडाल लगा रहे थे। लंगर की तैयारियां की जा रही थीं। बैनर सजाए जा रहे थे, जिन पर पाश की कविताओं की पक्तियां अंकित थीं-

युग को पलटने में मसरूफ लोग
बुखार से नहीं मरते
मौत के कंधे पर जाने वालों के लिए
मौत के बाद जिंदगी का सफर शुरू होता है।

मैं हैरान था, लंगर बनाने वालों में एक बुजुर्ग बेबे भी अपनी बूढ़ी उंगलियों से मटर के दाने निकालने में मसरूफ थी। वह पाश की मामी बंत कौर (शीला) थीं, जिन्होंने उसे अपने गोद में खिलाया था। आंखों मंे नमी, कांपते होंठ, लेकिन आवाज में वही जज्बा, जो अपने लोगों में पाश पैदा करना चाहते थे।

पड़ोस में ही अपने काम-धंधे को जल्दी-जल्दी निपटाकर पाश की याद में होने वाले प्रोग्राम की तैयारी में जुटने के लिए पाश के दोस्त शायर संत संधू दिखाई दे रहे थे। उनसे मिला। उन्होंने काम छोड़ दिया और मुझे पाश के उस पुराने घर में ले गए, जहां अब ताला लगा हुआ है।

कहने लगे, ‘इसी मकान के चौबारे में बैठकर वह कविताएं लिखते थे। यहीं दोस्तों की महफिलें सजती थीं।’ संत संधू देर तक उनके बारे में बातें करते रहे। इतने में लोगों के काफिले 23 मार्च के शहीदों को लाल सलाम कहते हुए आने लगे। पूरे गांव का माहौल क्रांतिकारी लग रहा था।

किसानों, मजदूरों के साथ-साथ लेखक और बुद्धिजीवी भी पहुंच रहे थे। पंडाल में पाश के गांव के बच्चे ने अपनी कविताएं सुनाईं। चेतना कला केंद्र बरनाला और गुरशरन भाजी की टीम ने नाटक खेले। पाश के सपनों को साकार करने के लिए सभी तत्पर नजर आ रहे थे।

इस माहौल में सबसे बड़ी बात थी, दिल्ली यूनिवर्सिटी से रिटायर्ड प्रोफैसर त्रिलोक घई द्वारा पाश की कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद रिलीज किया जाना। उन्होंने अपनी वर्षो की मेहनत को पाश से मोहब्बत का नाम देते हुए इसे इसी गांव में रिलीज करने की तमन्ना जाहिर की थी और आज डबडबाई आंखों से इस कार्य को पाश के लोगों के हवाले कर दिया।

One Response to “Paash Memorial Function in Talwandi Salem on 23rd March 2010”

  1. rajesh bijarnia Says:

    this is real red salute to com paash and his ideology. we can not forget his secrifice. com paash ko red salute

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