Legendary Naxal Leader Kanu Sanyal died

सिलीगुड़ी, जागरण संवाददाता। देश में सशस्त्र नक्सल आंदोलन के प्रणेता कानू सान्याल नहीं रहे। मंगलवार दोपहर साढ़े बारह बजे उनका दुखद अंत हो गया। 78 वर्षीय नक्सली नेता का शव सिलीगुड़ी में हाथीघीसा क्षेत्र स्थित सेफतुलाजोत के उनके घर में फंदे से झूलता मिला।

डीएसपी प्रशांत चंद्रा के अनुसार, प्रथम दृष्टया तो यह आत्महत्या की ही मामला लगता है, लेकिन पोस्ट मार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही इस बारे में कुछ सटीक कहा जा सकता है। जबकि भाकपा माले नेता आत्महत्या की बात से सहमत नहीं है, उनका कहना है कि वे सान्याल को ठीक तरह से जानते थे। लिहाजा खुदकुशी वाली बात स्वीकार नहीं कर सकते। पार्टी नेतृत्व ही इस बारे में कोई फैसला करेगा। दिवंगत नेता का अंतिम संस्कार बुधवार को सिलीगुड़ी में किया जाएगा।

चारू मजूमदार के साथ 1967 में नक्सलबाड़ी से जोतदारों के खिलाफ सशस्त्र अभियान की शुरुआत करने वाले कानू सान्याल काफी समय से बीमार चल रहे थे। उनके मौत की खबर जंगल में आग की तरह फैल गई। आम से खास तक उनके आवास की ओर दौड़ पड़े। उत्तार बंगाल के आईजी केएल टम्टा के अनुसार, दिन में करीब एक बज कर दस मिनट पर सान्याल के निधन की सूचना मिलते ही नक्सलबाड़ी थाना प्रभारी पंकज सरकार मौके पर पहुंच गए। पुलिस वालों ने नक्सली नेता के शव को फंदे से उतारा। डीएसपी प्रशांत चंद्रा तथा एएसपी गौरव दत्ता ने भी घटनास्थल का मुआयना किया। शाम साढ़े चार बजे नार्थ बंगाल मेडिकल कालेज में पोस्टमार्टम के बाद नक्सली नेता का पार्थिव शरीर शव गृह में सुरक्षित रख दिया गया। बुधवार सुबह नौ बजे कानू सान्याल के पार्थिव शरीर को भाकपा माले के नेताओं को सौंप दिया जाएगा। माले नेता प्रदीप सरकार के अनुसार, दिवंगत नेता का अंतिम संस्कार सिलीगुड़ी में किया जाएगा। इस अवसर पर वहां भारी तादाद में वामपंथी दिग्गजों के पहुंचने की उम्मीद है।

रोजाना की तरह ही अखबार पढ़े व टहले

कानू सान्याल ने प्रतिदिन की भांति मंगलवार को भी सुबह 8 बजे अखबार पढ़ने के बाद टहलने-घूमने निकले थे। फिर दोपहर 12 बजे स्नान व 12.30 बजे भोजन के बाद सोने चल गए। इस बीच उनसे मिलने पड़ोस की महिला शांति मुंडा पहुंची। जब उसने कानू सान्याल को बरामदे में बैठा नहीं पाया तो कमरे मेंझांका। अंदर उसने कानू सान्याल के शरीर को फंदे से झूलता पाया। पास में ही एक स्टूल पड़ा था। प्रतिदिन की तरह वे पूरी बांह वाली गंजी और लूंगी पहने हुए थे। शांति मुंडा के शोर मचाने पर गांव के ही प्रदीप व अन्य लोग वहां जुट गए। इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई।

हर कदम की मंजिल थी हाथीघिसा

कानू दा की मौत की खबर एक बजे तक जंगल की आग की तरह फैल चुकी थी। लोग स्तब्ध थे। हर कोई सच्चाई जानना चाहता था। उन्हें जानने वाला, जिसने भी सुना, उसके कदम खुद-ब-खुद हाथीघीसा के सेफतुलाजोत की तरफ बढ़ गए। कानू दा की मौत से शहर से लेकर ग्रामीण इलाके तक मातम का माहौल था। उनके दर्शन के लिए दलीय सीमाएं टूट चुकी गई। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और माकपा के राज्य सचिव विमान बोस के निर्देश पर सांसद समन पाठक, जीवेश सरकार व सिलीगुड़ी नगर निगम में विपक्ष के नेता मुंशी नुरुल इस्लाम ने जहां उन्हें श्रद्धांजलि दी। वहीं तृणमूल कांग्रेस भी पीछे नहीं रही। उसकी ओर से गौतम देव, पार्षद रंजनशील शर्मा तथा मिलन दत्ता श्रद्धासुमन अर्पित करने पहुंचे।

स्वर्गीय चारु मजूमदार के पुत्र सीपीआई एमएल लिबरेशन के नेता अभिजीत मजूमदार, सीपीआई एमएल न्यू डेमोक्रेसी के श्रीधर मुखर्जी, फांसीदेवा के विधायक छोटन किस्कू भी अपने समर्थकों के साथ कानू सान्याल के आवास पर पहुंचे।

क्लर्क से क्रांतिकारी तक का सफर

सिलीगुड़ी, जागरण संवाददाता। प्रख्यात कम्युनिस्ट नेता चारू मजूमदार के साथ मिलकर नक्सल आंदोलन को जन्म देने वालों में से एक कानू सान्याल का जन्म सन 1932 में दार्जिलिंग जिले के कर्सियांग में हुआ था। तब उनके पिता आनंद गोविंद सान्याल कर्सियांग कोर्ट में कार्यरत थे। अपने पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे कानू सान्याल ने कर्सियांग के ही एमई स्कूल से 1946 में मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की। बाद उन्होंने इंटर की पढ़ाई के लिए जलपाईगुड़ी कालेज में दाखिला लिया, मगर पढ़ाई बीच में ही छोड़ देनी पड़ी।

इसी बीच उन्हें कालिम्पोंग कोर्ट में राजस्व क्लर्क की नौकरी मिल गई। तबादले के बाद दार्जिलिंग व कर्सियांग कोर्ट में क्लर्क का काम किया। कुछ ही दिनों के बाद पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय को काला झंडा दिखाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में रहते हुए उनकी मुलाकात चारू मजूमदार से हुई। जेल से बाहर निकलने के बाद उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली और पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए। सन 1964 में जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन हुआ तो उन्होंने मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में रहना बेहतर समझा। इसके बाद उन्होंने 25 मई 1967 को दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी में चारू मजूमदार के साथ मिलकर सशस्त्र आंदोलन का बिगुल फूंका था और उसकी अगुवाई की थी। सन 1969 में लेनिन के जन्मदिन पर कोलकाता में आयोजित एक रैली में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी [मा‌र्क्सवादी-लेनिनवादी] के गठन की घोषणा की थी। उस समय कम्युनिस्ट विचारधारा से ओतप्रोत समाचार माध्यमों ने इन्हें महान क्रांतिकारी के रूप में पेश किया था। तब उनकी तुलना महात्मा गांधी व जतिन दास से की गई थी। जनता पर उनके प्रभाव को देखते हुएउन्हें पार्टी के पोलित ब्यूरो में स्थान मिला था। जनसंघर्षो की वजह से उन्हें अपने जीवन का 14 वर्ष जेल में गुजारना पड़ा था। इन दिनों वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी [माले] के महासचिव थे और नक्सलबाड़ी से सटे हाथीघीसा के सेफतुलाजोत में रह रहे थे। वह देश में बिखरे वामपंथी संगठनों को एकजुट करना चाहते थे, मगर उनका यह सपना साकार नहीं हो पाया।

नक्सलवाद शब्द से चिढ़ते थे कानू सान्याल

सिलीगुड़ी, जागरण संवाददाता। दिवंगत कानू सान्याल को ‘नक्सलवाद’ शब्द पर घोर आपत्तिथी। एक तरह से वह इससे चिढ़ते थे। उनका मानना था कि भले ही यह सशस्त्र आंदोलन नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ है, मगर उसका कोई वाद नहीं है। यदि इस आंदोलन के साथ कोई वाद जोड़ना बहुत जरूरी ही है तो वह है मा‌र्क्सवाद-लेनिनवाद-माओत्सेतुंगवाद। उनका तर्क होता था कि जब रूस में हुई क्रांति को कई रूसीवाद नहीं कहता तो नक्सलबाड़ी में हुए सशस्त्र आंदोलन को नक्सलवाद क्यों कहा जाता है? वह नक्सलवाद शब्द को मीडिया की देन मानते थे। हालांकि वह मानते थे कि खुद को नक्सली बातकर सशस्त्र आंदोलन का दावा करने वाले कुछ संगठन भटकाव की राह पर हैं। उनका कहना था कि बदूंक के बल पर जनाधार कायम नहीं किया जा सकता है। यदि बंदूक के बूते ही क्रांति संभव होती तो चंदन तस्कर वीरप्पन व दूसरे डाकू सबसे बड़े क्रांतिकारी बन गए होते।

कभी सत्ता की कभी चाह नहीं रही

लाखों लोगों के दिल पर राज करने वाले कानू दा चाहते तो सत्ता तक बहुत आसानी से पंहुच सकते थे, मगर उन्होने जीवन भर खुद को चुनावी राजनीति से दूर रखा। उन्हें कभी भी सत्ता की चाह नहीं रही। भाकपा माले नेता अभिजीत मजूमदार कहते हैं कि ज्योति दा और कानू दा लगभग एक साथ संघर्ष शुरू किए। ज्योति दा 27 साल तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे, मगर कानू दा ने अलग ही राह चुनी।

खुद के भीतर की लड़ाई से हार गए

लाखों लोगों की मानसिकता क्रांतिकारी बनाने वाले नक्सली नेता कानू दा खुद के भीतर चल रही मानसिक लड़ाई से हार गए। जीवन के आखिरी दिनों को हाथीघीसा के सेफतुलाजोत गांव में व्यतीत कर रहे कानू दा के बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक ताकतवर नेता खुद अपनी जिन्दगी के सफर को इस प्रकार विराम दे देगा। पोस्टमार्टम हाउस पर आए नक्सलवाद की स्थापना में कानू दा के सहयोगी रहे स्वर्गीय चारू मजूमदार के पुत्र तथा माले नेता अभिजीत मजूमदार उनकी मौत से स्तब्ध हैं।

अभिजीत के मस्तिष्क में आज भी कानू दा को लेकर बचपन की स्मृतियां ताजा हैं। वह बताते हैं कि जब 1969 में पार्टी के नेताओं को भूमिगत होना पड़ा था, तब कानू दा खाकी हाफ पैंट तथा खाकी शर्ट पहनकर छिपते हुए उनके घर आया करते थे। खाने के लिए वह अपनी जेब में चना रखते थे। उन्होने बताया कि एकबार पुलिस उन्हे खोज रही थी, तभी वह उनके घर आ गए। उनकी मां ने उनसे [कानू दा से] कहा कि क्यों निकले हो, पुलिस तुम्हे गिरफ्तार कर लेगी। इस पर कानू दा हंस कर मां की बात को टाल गए थे। उसके कुछ दिन के बाद ही वह गिरफ्तार कर लिए गए थे।

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