पाश की याद

गत दिनों विकास संवाद के एक कार्यक्रम में शिरकत करने की गरज से मैं महेश्वर गया था। वहीं से ओंकारेश्वर में नर्मदा पर बन रहे बांध से विस्थापित होने वालों के गांवों में भी जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। पता नहीं क्यों जिस दिन गांव वालों से मिला उसी दिन से अवतार सिंह पाश की कविता (हम लड़ेंगे साथी)बहुत याद आ रही है। महेश्वर से आने के बाद मैं काफी व्यस्त रहा लेकिन इस व्यस्तता में भी कविता के पुनर्पाठ के लिए व्याकुल रहा। जैसे ही फुर्सत मिली मैंने उक्त कविता को एक बार नहीं कई बार पढ़ा और चाहता हूं कि इसे दूसरे लोग भी पढे। 

हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिये
हम लड़ेंगे साथी, गुलाम इच्छाओं के लिये
हम चुनेंगे साथी, जिंदगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर
हल अब भी चलता हैं चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता है, प्रश्न नाचता है
प्रश्न के कंधों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी
कत्ल हुए जज्बों की कसम खाकर
बुझी हुई नजरों की कसम खाकर
हाथों पर पड़े घट्टों की कसम खाकर
हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का मूत पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले खुद नहीं सूंघते
कि सूजी आंखों वाली
गांव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्व से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने भाईयों का गला घोटने को मजबूर हैं
कि दफतरों के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की जरुरत बाकी है
जब तक बंदूक न हुई, तब तक तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद जिंदा रखने के लिए
हम लड़ेंगे

ajeet singh Bhopal, M.P., India

http://bighul.blogspot.com/2010/04/blog-post.html

One Response to “पाश की याद”

  1. inderjeetsingh Says:

    barson pahle ‘ lahoo hai ki manta nahee’ VBP HOUSE N. DELHI SE KHAREED KJAR PADHI. MAIN TO HIL GAYA. SAREE KAVITAYEN YAAD KARKE DOSTON KO SUNATA RAHTA HU.

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