स्त्री अस्मिता के संघर्ष की प्रतिच्छवि

स्त्री अस्मिता के संघर्ष की प्रतिच्छवि  
 
  6/12/2010
 

 
 
 
 
 
 
भारत में स्त्री मुक्ति का आंदोलन यहां के इतिहास, भूगोल, संस्कृति और मौजूदा पितृसत्तात्मक यथार्थ को ध्यान में रख कर ही चलाया जाना चाहिए, तभी उसके कारगर नतीजे सामने आयेंगे. सुप्रसिद्ध उपन्यासकार चित्रा मुद्गल के उपन्यास आंवा की स्थापना को उभारने की पूरी कोशिश, इसके नाटय़ रुपांतर में गत दिनों देखने को मिली. वरिष्ठ रंगकर्मी प्रताप जायसवाल की संस्था अभिनय ने कोलकाता  के शिशिर मंच में हाल में आंवा का मंचन किया.

चित्रा मुद्गल स्त्री विमर्श के स्थापित ढांचों का अतिक्रमण करते हुए, जो एक नया स्र्ोत बनाती हैं, जिसमें भविष्य का विजन भी होता है उस ओर भी नायक ने यथेष्ठ संकेत किया है.प्रताप जायसवाल ने आवां की कथा के मूल को, मर्म व महत्व को और सार को अक्षुण्ण रखा है. सतर्कतापूर्वक मंचन के पाठ से कहानी के पाठ को करीब रखने से ही ऐसा संभव होता है.

नमिता, अंजना, स्मिता, किशोरी बाई, सुनंदा, गौतमी, मुनिया, नीलम्मा, अन्ना साहब, पवार, देवीशंकर पांडे, संजय कनोई, सिद्धार्थ, चालीवाला, अकरम और शेवाड़े जासे जैसे पात्र जब तक उपन्यास में थे, निर्जीव थे. मंच पर वे सजीव हो उठे.

अपनी खूबियों और खामियों के साथ. नमिता का संघर्ष, आत्म संघर्ष, उसकी हताशा, आशा और त्रासदी दरअसल शारीरिक, मानसिक और ओत्मक स्वतंत्रता का स्वप्न देखती हर औसत भारतीय स्त्री की त्रासदी है. बाजारवाद ने उसे न सिर्फ़ भोग की वस्तु बना दिया है, बल्कि हर जगह वह शोषित होने को बाध्य है. बाजारवाद की निर्मम ग्लोबल सच्चाई मनुष्य के रूप में स्त्री की पहचान छिनते हुए और उसके बचे रहने की संभावना को लगातार किस तरह क्षीण कर रही है, इसे दिखाने में नायक सफ़ल रहता है.

कुल 39 दृश्यों में बंटे दो घंटे के इस नाटक में दृश्यांतर के समय उभरते अंधेरे में पाश की ये काव्य पंक्तियां बार-बार गूंजती हैं – हम लड़ेंगे कि लड़े बगैर / कुछ नहीं मिलता / हम लड़ेगे कि अब तक / लड़े क्यों नहीं / जो लड़ते हुए मर गये/ उनकी याद जिंदा रखने को / हम लड़ेंगे साथी / हम लड़ेंगे.. इस कविता की गूंज देर तक व दूर तक बनी रहती है. नमिता के रूप में सोनल बोथरा और संजय कनोई के रूप में प्रताप जायसवाल का अभिनय उम्दा है कनिका दास, नयना जाना, अमित राय, रौनिका चौहान, शुभ्रा खेतान, संजय श्रीवास्तव, इजहर करीम, सुमन बोथरा, सीमा उपाध्याय, मुकेश पारीक और शकील ने भी अपने-अपने चरित्रों के साथ न्याय किया. ‘आंवा’ का नाटय़ रुपांतर व नमिता जायसवाल ने किया है.

मंच सज्जा समीर, प्रकाश व्यवस्ता सुशांतो और संगीत स्वप्न चक्रवर्ती का था. मंचन के समय ‘आंवा’ की लेखिका चित्रा मुद्रुल और प्रकाशक महेश भारद्वाज भी उपस्थित थे. मंचन के बाद दोनों अभिभूत थे. बंगाल के अनेक लेखकों, संस्कृतिकर्मियों और नापक प्रेमियों से सभागार खचाखच भरा हुआ था. कहने की जरूरत नहीं कि यह नापक भविष्य में अपने कथ्य, लेखन शैली और दमदार रंग प्रस्तुति के कारण जाना जायेगा.

 

http://www.prabhatkhabar.com/news/33086.aspx

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