पाश का पुनर्पाठ

पाश का पुनर्पाठ

प्रकाशन :शनिवार, 1 मई 2010

विश्वजीत सेन
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
पाश की कविताएँ पुनर्पाठ की माँग करती है । ख़ासकर उनकी काव्य-श्रृंखला ‘कामरेड से बातचीत’। हम सभी जानते हैं कि पाश, शुद्ध रूप से कवि होने में विश्वास नहीं रखते थे। अपनी काव्य-यात्रा में उन्होंने राजनीति को भी सहचर के रूप में रखा। इसकी वजह से उनकी कविताओं में एक नए क़िस्म की चमक आई । और वे यादगार बन गईं। मरणोपरांत, पाश की कविताओं पर आलोचनात्मक लेख भी बहुतायत में लिखे गए। लेकिन पता नहीं क्यों, ‘कामरेड से बातचीत’ श्रृंखला की गहराई में जाकर विश्लेषण करने का आग्रह किसी ने नहीं दिखाया। इस श्रृंखला का विश्लेषण हुआ भी तो सतही ढंग से। अगर आलोचकों ने हिम्मत दिखाई होती, तो बहुत सारे प्रश्न; जो आज हमारे मस्तिष्क को कुरेद रहे हैं, स्वतः समाप्त हो जाते। हमें सच्चाई और अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती और यथार्थ के हम काफ़ी क़रीब होते।

पाश कम्युनिस्ट थे और पंजाब के कठिनतम दौर में वे कम्युनिस्ट बने। एक ओर भ्रष्ट राजनीतिज्ञों का बोलबाला चरम को छूने जा रहा था। दूसरी ओर कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा संचालित आन्दोलनों में अनिर्णय की स्थिति, उन्हें किसी मंजिल तक पहुँचाने में उनकी नाक़ामयाबी, और इस बात से उत्पन्न निराशा- पाश की कविताओं में यथार्थ के इन पहलुओं से हमारी मुलाक़ात होती है। पाश सी.पी.आई. के सदस्य रहे । पाश नक्सलवाद में भी यक़ीन करने लगे। अंतिम दौर में उनके मुख्य दुश्मन खालिस्तानी आतंकवादी थे, जो भ्रष्ट राजनीतिज्ञों की कोख से पैदा हुए थे । और जिनपर अब उनका भी नियंत्रण नहीं रह गया था।

लेकिन अपनी तमाम राजनीतिक घुमक्कड़ी के बावजूद, पाश सामाजिक और दार्शनिक प्रश्नों से भी रु-ब-रु होते रहे। उनका रु-ब-रु होना आलोचकों को अच्छा नहीं लगा होगा। किसी आलोचक ने बड़े ही प्रायोजित ढंग से ऐसी कविताओं को उनके अकेलापन की उपज मान लिया-ख़ासकर ‘कामरेड से बातचीत’ श्रृंखला को, जबकि बात बिल्कुल विपरीत थी। पाश वामपंथी राजनीति की मूल स्थापनाओं पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे थे। इस वामपंथी राजनीति में नक्सलपंथी राजनीति को भी उन्होंने शामिल कर लिया था। ‘कामरेड से बातचीत’ को उनके अकेलापन की उपज मान लेना आसान है, लेकिन मूल रूप में यह श्रृंखला क्रांतिकारी राजनीति के यांत्रिक कार्यान्वयन के विरोध में खड़ी होती है। इसे समझने के लिए इस श्रृंखला की गहराई में उतरना आवश्यक है। ‘कामरेड से बातचीत-1’ में पाश लिखते हैं-

‘कामरेड, मध्यवर्ग अभी भी भगोड़ा है
संघर्ष से नहीं
यह पागलख़ाने से निकल भागा मुज़रिम है
और कभी तो घरवालों, कभी पुलिस की तरह
सिद्धांत इसका पीछा कर रहे हैं
कामरेड, क्षमा करना, उसे गाली देना ठीक नहीं
जो केवल अपने ही पीछे छूट गई गूंज है।’

पाश के निशाने पर मध्यमवर्ग का वह हिस्सा है, जो हमेशा वास्तविकता को सिद्धांत के तराजू पर तौलता आया है। इसके अंजाम न कभी अच्छे हुए हैं, न होंगे। लेकिन ‘पागलख़ाने से निकल भागे मुज़रिम’ को भला यह बात समझाए कौन? भारत के इतिहास में बराबर वामपंथी इसी वजह से परास्त होते रहे हैं। 1948 में रुस के तर्ज पर मज़दूर क्रांति, फिर आगे चीन के तर्ज पर किसान क्रांति और अंत में क्रांतिकारी महत्वाकांक्षाओं को दफ़नाकर मुख्य धरा में वापसी। आज के दिन, दंतेवाड़ा में माओ-त्से-तुंग के येनाम के तर्ज पर मुक्त इलाक़ा…………..। दरअसल यह 20 वीं सदी के 40-50 के दशक के तेलंगाना विद्रोह की वह गूंज है, जो पीछे छूट गई।

और भगोड़ापन! विमर्श से भगोड़ापन, बातचीत से भगोड़ापन! केवल बन्दूक, सिर्फ़ बन्दूक! दिसंबर, 2009 वाले ‘अनीक’ पत्रिका (बंगला) में लालगढ़ के सन्दर्भ में संबित दास मन्तव्य करते हैं-“उनके प्रभाव में जो इलाक़े हैं, वहाँ के सारे राजनीतिक दलों पर कभी घोषित, कभी अघोषित प्रतिबंध लगाए गए हैं। ठीक इसी तरह का बर्ताव राजसत्ता भी करती आयी है। माओवादी वास्तविकता में भविष्य के किसी राष्ट्र के तानाशाह जैसा बर्ताव कर रहे हैं। उसी के माध्यम से उनके कल्पना में बसे राष्ट्र की छवि भी साफ़ हो रही है, जँहा एक ही पार्टी का लाइन सर्वोपरि होगा, उस लाइन के अनुशासन से बंधे होने के अलावे कोई विकल्प नहीं रह जाएगा। सम्पूर्ण समाज को एक दलीय शासन के शिकंजे से जकड़ने की यह परियोजना कहाँ तक क्रांति के पक्ष में है, जो वास्तव में राष्ट्र को और अध्कि शक्तिशाली बनाती है मार्क्स के सिद्धांत के विपरीत जाकर इस प्रश्न का मुँह भी बंद नहीं रखा जा सकेगा।”

पहले भी इस कार्यशैली का अनुसरण किया गया, ख़ासकर चारु मजूमदार वाले दौर में। इस कार्यशैली का एक दुखद अंजाम यह हुआ कि मार्क्सवाद जैसे वैज्ञानिक दर्शन से भी जनता की दूरी बढ़ती गई। जिसे-तिसे वर्ग शत्रु कह देने का एक चलन चल पड़ा, जिसके प्रति पाश का मन्तव्य भी तीखा व्यंग से सराबोर है। ‘ कामरेड से बातचीत-2’ में पाश लिखते हैं:-

‘कामरेड, यह गुड्डो बहुत क्रांति-विरोधी निकली
निरी वर्ग शत्रुता
यह मेरी विद्वता भरी पुस्तकों के नीचे गीटें छिपा देती हैं
लाख समझाने पर भी समाज के भविष्य से
थाली खेलने की ज़्यादा चिंता करती है
उसका लेनिन को गंजा पकड़ने वाला कहना
और माओ को शर्मा थानेदार- जैसे गलीज से मिला देना
भला तुम ख़ुद सोचो/ कितना असहनीय है ………’

‘गुड्डो विद्वता भरी पुस्तकों के नीचे गिटें छिपा देती है’ इस मन्तव्य में काव्यात्मकता के साथ-साथ सच्चाई का एक वैसा पहलु भी है, जिससे रु-ब-रु होना हमें पसन्द नहीं। हम झूठ बोलते हैं, निरन्तर झूठ बोलते हैं। विद्वता भरी पुस्तकें केवल हमारी झूठ पर पर्दा डालने के लिए हैं। हमारी झूठ एक शिल्प की शक्ल अख़्तियार कर चुकी है। हमारे विरुद्ध हो, ऐसी किसी भी सच्चाई को हम ‘ बुर्जुवा दुष्प्रचार’ कह देते हैं और माओवादी ढंग से एक ‘एक सच्चाई’ को गढ़ लेते हैं। ‘कामरेड़ से बातचीत’-5 में पाश लिखते हैं- ‘ अख़बार तुम्हे कभी-कभी मिलता है कामरेड?/ तुम इन टुकड़ख़ोर ख़बरों का बिल्कुल सच न मानना/ पिछले वर्ष जो डूब कर मरी थी गाँव के पोखर में/ वह माँ नहीं थी/ यों ही नीली छत से ईंट उखड़कर जा गिरी थी/ माँ तो पहले ‘रेड’ पर ही गोर्की के नाव में तैरने की कोशिश करती हुई/ पुलिस की पँहुच से भाग निकली थी/ वह अब भी कभी नाव के किनारों को / घूरती है/ और कभी अपनी ही आशीष की तरह खुरने लगती है’

सिलदा (पश्चिम बंगाल) और दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) के नृशंस नरसंहारों को जिन्होंने अंजाम दिया, उन्हें जब अरुंधती राय जैसी सम्मानित लेखिका, सम्मान के लायक बनाने की कोशिश में जी-जान एक करने लगती हैं तब हम पाश की इन पँक्तियों को याद करने को बाध्य हो जाते हैं। अरुंधती राय के पास अपने कारण होंगे। उन कारणों की गहराई में जाने की इच्छा मुझे नहीं है। मैं तो बस केवल पाश की ही कुछेक और पँक्तियों को याद कर सकता हूँ:- उनमें लिपटी संवेदनाओ ने/ भला तुम्हारा क्या छीना था? (कामरेड से बातचीत-4 )

पाश आगे लिखते हैं –‘सिर्फ़ अपनी सुविधe के लिए तुमने/ शब्दों को तराशना सीख लिया है/ जैसे हदबंदी के लिए कोई पटवारी से मिलता है/ तुमने इन्हें इस तरह कभी नहीं देखा/ जैसे अंडों में मचल रहे चूजे हों/ जैसे बारिश की चू रही साँवली दोपहर में/ धूप घुली हो।’

पाश की हत्या 1988 में कर दी गई। वे अपनी कविता में जिन सवालों को उठा रहे थे, उनके कारण खालिस्तानी उग्रवादिओं की दिक्कतें बढ़ रही थी। उनकी हत्या के बाद 22 वर्ष गुज़र गए, लेकिन उनकी कविताएँ आज भी जीवित हैं। वे केवल जीवित ही नहीं हैं, अगर उन्हें ठीक से पढ़ा जाए, तो उनमें उठाए गए सवाल माओवादी उग्रवादियों को भी दिक्कत में डाल सकते हैं। उनकी कविताओं में सम्पूर्ण मार्क्सवादी चिन्तन पर भी सवालिया निशान लगाए गए हैं। इसके साथ-साथ उनकी कविता तमाम कठमुल्लापन से मुक्त होकर जनता के बीच जाने की एक उदात्त पुकार भी है। उस पुकार को आप सुनी-अनसुनी कर सकते हैं, लेकिन भविष्य में इस ग़लती की भरपाई आप ही को करनी होगी।


 

 

  विश्वजीत सेन
दिवंगत डॉ.ए.के.सेन का निवास
रामकृष्ण एवेन्यु, पटना-80004
wolvorine1802@gmail.com
 
 

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