इन सपनों का क्या करें?

इन सपनों का क्या करें?

विनोद वर्मा | सोमवार, 11 जनवरी 2010,

कवि पाश ने कहा था, ‘सबसे ख़तरनाक होता है सपनों का मर जाना…’

एक बच्चा उड़ीसा के जंगलों में मिला था. 11-12 साल का. उसने बताया कि उसका पिता किसान है. और उत्सुकतावश पूछा कि किसान यानी? तो उसने मासूमियत से कहा, ग़रीब आदमी. वह बच्चा नक्सलियों के साथ रहता और घूमता फिरता है. एके-47 से लेकर पिस्टल तक सब कुछ चलाता है. वह बड़ा होकर नक्सली बनना चाहता है. उसका कहना है कि अपने लोगों का भला ऐसे ही हो सकता है.

एक बच्चा बलिया में मिला. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के गुज़र जाने के बाद, उनके बंगले की रखवाली करता हुआ. वह दस साल का रहा होगा. पान मसाला खाते हुए वह बताता है कि एक दिन वह अपने बड़े भाई के दुश्मनों को चाकू मारना चाहता है और कट्टा हासिल करके वह अपने नेताजी के लिए काम करना चाहता है. इस काम में उसे रुतबा दिखाई देता है.

एक बच्ची मुज़फ़्फ़रपुर के रेडलाइट एरिया में मिली. उम्र बमुश्किल आठ साल. यह जानने के बाद कि मैं दिल्ली में रहता हूँ, उसने उत्सुकता के साथ कहा कि एक दिन वह मुंबई जाना चाहती है. करना वही चाहती है, जो उसकी माँ मुज़फ़्फ़रपुर में करती है. वह कहती है कि इस काम में उसे कोई बुराई नहीं दिखती, लेकिन यह शहर ख़राब है.

एक बच्चा दिल्ली के बड़े स्कूल में पढ़ता है. आठवीं कक्षा में. डिस्कवरी चैनल पर ‘फ़्यूचर वेपन’ यानी भविष्य के हथियार कार्यक्रम को चाव से देखता है. वह एक दिन सबसे ज़्यादा तेज़ी से गोली चलाने वाले बंदूक का आविष्कार करना चाहता है. उसका तर्क है कि गोलियों से आख़िर बुरे लोग ही तो मारे जाते हैं.

पाश की कविता अक्सर लोगों को रोमांचित करती है. लेकिन इन बच्चों के सपने सुनकर तो रूह काँप जाती है.

क्या इन सपनों को भी ज़िन्दा रखा जाए?

http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2010/01/post-67.html

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