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गुरुशरण सिंह होने का मतलब

Posted in Gursharan Singh, Indian People's Theatre Association, marxism, Paash-in Hindi, Paash-Life and Times, Shaheed Bhagat Singh with tags , , on December 6, 2011 by paash

Saturday, 01 October 2011

गुरुशरण सिंह होने का मतलब

1980 के दशक में गुरुशरण सिंह ने सांस्कृतिक आंदोलन को संगठित करने के प्रयास में उत्तर प्रदेशबिहार सहित कई राज्यों का दौरा किया. उनकी नाटक टीमें बिहार के पटना भोजपुर के किसान आंदोलन के संघर्ष के इलाकों में गईं. उत्तर प्रदेश के तराई के क्षेत्र जैसे पूरनपुरपीलीभीतबिन्दुखताहल्द्वानीकाशीपुर में उनके नाट्य प्रदर्शन हुए. इसी क्रम में वे कई बार लखनऊ भी आये. उन्होंने लखनऊ के एवेरेडी फैक्ट्री गेट, उत्तर रेलवे के मंडल कार्यालय के प्रांगण रेलवे इंस्टीच्यूटजनपथ मार्केट सहित सड़को नुक्कड़ों पर गड्ढा’, ‘जंगीराम की हवेली’, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और फैज जगमोहन जोशी के गीतों के द्वारा जो सांस्कृतिक लहर पैदा कीवह आज भी हमें याद है 

कौशल किशोर

भगत सिंह के जन्म दिवस 28 सितम्बर के दिन मशहूर नाटककार गुरुशरण सिंह का निधन हुआ. शहीद भगत सिंह के शहादत दिवस यानी 23 मार्च के दिन ही पंजाबी के क्रान्तिकारी कवि अवतार सिंह पाश आतंकवादियों के गोलियों के निशाना बनाये गये थे. यह सब संयोग हो सकता है. लेकिन पंजाब की धरती पर पैदा हुए पाश और गुरुशरण सिंह द्वारा भगत सिंह के विचारों और उनकी परम्परा को आगे बढ़ाना कोई संयोग नहीं है. भगत सिंह ने शोषित उत्पीडि़त मेहनतकश जनता की मुक्ति में जिस नये व आजाद हिन्दुस्तान का सपना देखा था, उसी संघर्ष को आगे बढ़ाने वाले ये सांस्कृतिक योद्धा रहे हैं. भगत सिंह के क्रान्तिकारी विचारों व संघर्षों को आगे बढ़ाना इनके कलाकर्म का मकसद रहा है. भले ही भगत सिंह ने इस संघर्ष को राजनीतिक हथियारों से आगे बढ़ाया, वहीं पाश ने यही काम कविता के द्वारा तथा गुरुशरण सिंह ने ताउम्र अपने नाटकों से किया. गुरुशरण सिंह के निधन पर उनकी बेटियों की प्रतिक्रिया थी कि उन्हें अपने पिता पर गर्व है. उन्होंने अपने उसूलों के साथ कभी समझौता नहीं किया. गुरुशरण सिंह होने का मतलब भी यही है. कला को हथियार में बदल देने तथा सोद्देश्य संस्कृति कर्म का इससे बेहतरीन उदाहरण नहीं हो सकता है.

यों तो 1929 में मुल्तान में जन्मे गुरुशरण सिंह अपने छात्र जीवन में ही कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ गये थे. लेकिन एक नाटककार व संस्कृतिकर्मी के रूप में उनके रूपान्तरण की कहानी बड़ी दिलचस्प है. वे बुनियादी तौर पर विज्ञान के विद्यार्थी थे. सीमेन्ट टेक्नालाजी से एम.एस.सी. किया. पंजाब में जब भाखड़ा नांगल बाँध बन रहा था, उन दिनों वे इसकी प्रयोगशाला में बतौर अधिकारी कार्यरत थे. वहाँ राष्ट्रीय त्योहारों को छोड़कर किसी भी दिन सरकारी छुट्टी नहीं दी जाती थी. उन्हीं दिनों लोहड़ी का त्योहार आया जो पंजाब का एक महत्वपूर्ण त्योहार है. मजदूरों ने इस त्योहार पर छुट्टी की मांग की और प्रबंधकों द्वारा इनकार किये जाने पर मजदूरों ने हड़ताल कर दी.

गुरुशरण सिंह ने मजदूरों की भावनाओं को आधार बनाकर एक नाटक तैयार किया. इसे मजदूरों के बीच जगह जगह खेला गया. इस नाटक ने अच्छा असर दिखाया. यह नाटक काफी लोकप्रिय हुआ. इसमें गुरुशरण सिंह ने भी बतौर कलाकार भूमिका की. और अंततः प्रबन्धकों को झुकना पड़ा. मजदूरों की मांगें मान ली गई. इसने नाटक और कला की ताकत से गुरुशरण सिंह को परिचित कराया और इस घटना ने उन्हें नाटक लिखने, नाटक करने वालों का ग्रूप बनाने, दूसरों के लिखे नाटकों को करने या कहानियों का नाट्य रूपान्तर आदि के लिए प्रेरित किया.

गुरुशरण सिंह पंजाब में इप्टा के संस्थापकों में थे. नाट्य आंदोलन को संगठित व संस्थागत रूप देने के लिए उन्होंने 1964 में अमृतसर नाटक कलाकेन्द्र का गठन किया ताकि कलाकारों को शिक्षित प्रशिक्षित किया जाय, शौकिया कलाकार की जगह उन्हें पूरावक्ती कलाकार में बदला जाय तथा उनकी भौतिक जरूरतों को पूरा करते हुए उनके पलायन को रोका जाय. गुरुशरण सिंह के नाटको की खासियत है कि यह अपनी परम्परा के प्रगतिशील विचारों को, संघर्ष की विरासत को आगे बढ़ाता है, उसे विकसित करता है. वह इतिहास के सकारात्मक पहलुओं को तात्कालिक परिस्थितियों से जोडता है. यही कारण है कि इनके नाटक तात्कालिक होते हुए भी तात्कालिक नहीं होते बल्कि उनमें अतीत, वर्तमान और भविष्य आपस में गुथे हुए हैं.

नक्सलबाड़ी के किसान आंदोलन का गहरा असर पंजाब में भी था. उन्हीं दिनों गुरुनानक देव का 500 वाँ जन्म दिन आया. इस मौके पर गुरुशरण सिंह ने नानक के प्रगतिशील विचारों को आधार बनाकर अपने मित्र गुरुदयाल सिंह सोढ़ी के नाटक ‘जिन सच्च पल्ले होय’ को आज के सच से जोड़ते हुए प्रस्तुत किया. पंजाब में इस नाटक का अपना इतिहास है. यह नाटक आश्चर्यजनक रूप से लोकप्रिय हुआ और पंजाब के करीब 1600 गाँवों में इसका मंचन हुआ. भगत सिंह के जीवन और विचारधारा पर आधारित नाटक ‘इंकलाब जिंदाबाद’ की कहानी इससे अलग नहीं है. न सिर्फ पंजाब में बल्कि देश के शहरों से लेकर गांव गांव में इसके मंचन हुए. उनके नाटकों में लोक नाट्य रूपों व लोक शैलियों का प्रयोग देखने को मिलता है. वे मंच नाटक और नुक्कड़ नाटक के विभाजन को कृत्रिम मानते थे तथा इस तरह के विभाजन के फलसफे को नाटककारों व रंगकर्मियों की कमजोरी मानते थे. 

गुरुशरण सिंह उन लोगों में रहे जिन्होंने लागातार सत्ता के दमन को झेलते हुए सांस्कृतिक आंदोलन को आगे बढ़ाया. अपने नाटक ‘मशाल’ के द्वारा उन्होंने इंदिरा गाँधी की तानाशाही का विरोध किया था. इसकी वजह से उन्हें इमरजेन्सी के दौरान दो बार गिरफ्तार भी किया गया. अपनी प्रतिबद्धता की कीमत अपनी नौकरी गवाँकर चुकानी पड़ी. अस्सी के दशक में पंजाब के जो हालात थे तथा गुरुशरण सिंह को आतंकवादियों की ओर से जिस तरह की धमकियाँ मिल रही थी, उसने हम जैसे तमाम लोगों को गुरुशरण सिंह के जीवन की सुरक्षा को लेकर चिन्तित कर रखा था. पर गुरुशरण जी उनकी धमकियों से बेपरवाह काम करते रहे और अपनी मासिक पत्रिका ‘समता’ में आतंकवाद के विरोध में लगातार लिखते रहे. उन्हीं दिनों आतंकवाद के विरोध में उनका चर्चित नाटक ‘बाबा बोलता है’ आया. उन्होंने न सिर्फ इसके सैकड़ों मंचन किये बल्कि भगत सिंह के शहादत दिवस 23 मार्च पर आतंकवाद के विरोध में भगत सिंह के जन्म स्थान खटकन कलां से 160 किलोमीटर दूर हुसैनीकलां तक सांस्कृतिक यात्रा निकाली जिसके अन्तर्गत जगह जगह उनकी टीम ने नाटक व गीत पेश किये. यह साहस व दृढता जनता से गहरे लगाव, उस पर भरोसे तथा अपने उद्देश्य के प्रति समर्पण से ही संभव है. यह गुण हमें गुरुशरण सिंह में मिलता है. अपने इन्हीं गुणों की वजह से सरकारी दमन हो या आतंकवादियों की धमकियां, उन्होंने कभी इनकी परवाह नहीं की और सत्ता के खिलाफ समझौता विहीन संघर्ष चलाते रहे.

गुरुशरण सिंह ने करीब पचास के आसपास नाटक लिखे, उनके मंचन किये. ‘जंगीराम की हवेली’, ‘हवाई गोले’, ‘हर एक को जीने का हक चाहिए’, ‘इक्कीसवीं सदी’, ‘तमाशा’, ‘गड्ढ़ा’ आदि उनके चर्चित नाटक रहे हैं. भले ही उनके सांस्कृतिक कर्म का क्षेत्र पंजाब रहा हो, पर उनका दृष्टिकोण व्यापक व राष्ट्रीय था. वे एक ऐसे जन सांस्कृतिक आंदोलन के पक्षधर थे जो अपनी रचनात्मक ऊर्जा संघर्षशील जनता से ग्रहण करता है और इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए जनवादी व क्रान्तिकारी संस्कृतिकर्मियों के संगठन की जरूरत को वे शिद्दत के साथ महसूस करते थे. यही कारण था कि जब क्रान्तिकारी वामपंथी धारा के लेखकों व संस्कृतिकर्मियों को संगठित करने का प्रयास शुरू हुआ तो उनकी भूमिका नेतृत्वकारी थी. इसी प्रयास का संगठित स्वरूप 1985 में जन संस्कृति मंच के रूप में सामने आया. गुरुशरण सिंह इस मंच के संस्थापक अध्यक्ष बने. उन्होंने चण्डीगढ़ में 25 व 26 अक्तूबर 1986 को मंच का पहला स्थापना समारोह आयोजित किया जो सत्ता के दमन और आतंकवाद के विरुद्ध सांस्कृतिक हस्तक्षेप था.

गुरुशरण सिंह क्रान्तिकारी राजनीतिक आंदोलनों से भी घनिष्ठ रूप से जुड़े थे. कहा जा सकता है कि इन्हीं आंदोलनों ने उनके वैचारिकी का निर्माण किया था. वामपंथ की क्रान्तिकारी धारा इण्डियन पीपुल्स फ्रंट से उनका गहरा लगाव था तथा उसके सलाहकार परिषद के सदस्य थे. भाकपा (माले) के कार्यक्रमों में वे गर्मजोशी के साथ शामिल होते थे. वे संस्कृति कर्म तक अपने को सीमित कर देने वाले कलाकार नहीं थे. इसके विपरीत उनकी समझ संस्कृति और राजनीति की अपनी विशिष्टता, सृजनात्मकता तथा स्वायतता पर आधारित उनके गहरे रिश्ते पर जोर देती है.

1980 के दशक में गुरुशरण सिंह ने सांस्कृतिक आंदोलन को संगठित करने के प्रयास में उत्तर प्रदेश, बिहार सहित कई राज्यों का दौरा किया. उनकी नाटक टीमें बिहार के पटना व भोजपुर के किसान आंदोलन के संघर्ष के इलाकों में गईं. किसान जनता के बीच नाटक किये. उत्तर प्रदेश के तराई के क्षेत्र जैसे पूरनपुर, पीलीभीत, बिन्दुखता, हल्द्वानी, काशीपुर में उनके नाट्य प्रदर्शन हुए. इसी क्रम में वे कई बार लखनऊ भी आये. उन्होंने लखनऊ के एवेरेडी फैक्ट्री गेट, उत्तर रेलवे के मंडल कार्यालय के प्रांगण व रेलवे इंस्टीच्यूट, जनपथ मार्केट सहित सड़को व नुक्कड़ों पर ‘गड्ढा’, ‘जंगीराम की हवेली’, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और फैज व जगमोहन जोशी के गीतों के द्वारा जो सांस्कृतिक लहर पैदा की, वह आज भी हमें याद है.  गुरुशरण सिंह सही मायने में जनता के सच्चे सांस्कृतिक योद्धा थे, ऐसा योद्धा जो हिन्दुस्तान की शक्ल बदलने का सपना देखता है, इंकलाब के लिए अपने को समर्पित करता है और अपनी ताकत शहीदों के विचारों व संघर्षों से तथा लोक संस्कृति से ग्रहण करता है. गुरुशरण सिंह अक्सरहाँ कहा करते थे ‘हमारी लोक संस्कृति की समृद्ध परम्परा नानक, गुरुगोविन्द सिंह और भगत सिंह की है. दुल्हा वट्टी एक मुसलमान वीर था जिसने मुसलमान शासकों के ही खिलाफ किसानों को संगठित किया था – हमारी लोकगाथाएँ यह है. आज के पंजाब और हमारे वतन हिन्दुस्तान को आशिक-माशूक के रूप में न देखा जाय, बल्कि आज के हिन्दुस्तान को, जालिम और मजलूम की शक्ल में देखा जाय, इंकलाब की शक्ल में देखा जाय.

http://www.janjwar.com/2011-06-03-11-27-26/78-literature/1961-2011-10-01-06-33-21

देर रात गये पाश से हुई मुलाकात (चारूचंद्र पाठक)

Posted in Paash-in Hindi with tags , on December 6, 2011 by paash

8.27.2011

 

देर रात गये पाश से हुई मुलाकात

चारूचंद्र पाठक

 

 

कल देर रात न्यूज चैनल में छाए भ्रष्टाचारविरोधी अन्नाआंदोलन की खबरों और रामलीला मैदान में गूंज रहे वंदे मातरम और इंकलाब जिंदाबाद के नारों को देखतेसुनते हुए, अचानक मेरी निगाह अपनी बगल में रखे स्टूल पर बैठे पाश पर गई। मैं पाश को अपने सामने देखकर चौंक पड़ा। पाश तो 23 मार्च, 1988 को ही ख़लिस्तानियों के हाथों शहीद हो गये थेफिर यहांइस वक्
मैं इन्हीं खयालों में डूबा और असमंजस में पड़ा हुआ एकटक उन्हें देखे जा रहा था, और वे चुपचाप मंदमंद मुस्करा रहे थे। मैं जाने और कितनी देर उन्हें यूं ही देखता रहता, अगर उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर यह कहा होता, ”इंसान अपने विचारों के रूप में हमेशा जिंदा रहता है

 

मैं अब भी पशो-पेश में था, दिमाग अचानक ब्‍लैंक हो गया था…

 

पाश ने टीवी की तरफ इशारा करके कहा, ”तमाशा जारी है?”

 

मैंने कहा, ”हां, आजकल पूरे मीडिया और देश में बस यही छाया हुआ है…” मेरा दिमाग़ अभी पूरी तरह शांत नहीं पाया था। मैंने पाश से पूछा, ”आपकी इस पर क्‍या राय है?”

 

पाश हँसे, ”मेरी राय तो तुमने अपनी किताबों की सेल्‍फ में लगा रखी है!!!”

मैंने पलटकर किताबों के शेल्‍फ पर नजर डाली और पाश का कविता संकलन ”अक्षर-अक्षर” नज़र आया। मैंने हाथ बढ़ाकर किताब निकाल ली, और पाश की तरफ देखा…

 

पाश ने मेरे हाथ से किताब ले ली, और कहा, ”इसमें है मेरी राय। फिर भी, अगर कुछ खास सवाल हों, तो बोलो, मैं तुम्‍हें अपने विचार बता दूंगा।”

 

पाश की मौजूदगी से मैं अब भी चकित था।

 

मैं : ”यह कहा जा रहा है कि अब हिन्‍दुस्‍तान से भ्रष्‍टाचार खत्‍म हो जाएगा… देश में एक बड़ा परिवर्तन आ जाएगा…”

 

पाश :

”हम झूठ-मूठ का कुछ भी नहीं चाहते

जिस तरह हमारे बाजुओं में मछलियां हैं,

जिस तरह बैलों की पीठ पर उभरे

सोटियों के निशान हैं,

जिस तरह कर्ज के कागजों में

हमारा सहमा और सिकुड़ा भविष्‍य है

हम जिंदगी, बराबरी या कुछ भी और

इसी तरह सचमुच का चाहते हैं

….

हम झूठ-मूठ का कुछ भी नहीं चाहते

और हम सबकुछ सचमुच का देखना चाहते हैं —

जिंदगी, समाजवाद, या कुछ भी और…।”

(कविता का शीर्षक — प्रतिबद्धता)

 

मैंने पूछा, ”एक और नया कानून बनाने की बात चल रही है, जिससे देश में भ्रष्‍टाचार समाप्‍त हो जाएगा। आपको क्‍या लगता है?”

 

पाश ने किताब के पन्‍ने पलटकर एक कविता की ओर इशारा कर दिया :-

 

”यह पुस्‍तक मर चुकी है

इसे मत पढ़ो

इसके लफ्जों में मौत की ठण्‍डक है

और एक-एक पन्‍ना

जिंदगी के अंतिम पल जैसा भयानक

यह पुस्‍तक जब बनी थी

तो मैं एक पशु था

सोया हुआ पशु

और जब मैं जागा

तो मेरे इंसान बनने तक

ये पुस्‍तक मर चुकी थी

अब अगर इस पुस्‍तक को पढ़ोगे

तो पशु बन जाओगे

सोये हुए पशु।”

(कविता का शीर्षक — संविधान)

 

मैं : ”शांति और अहिंसा के गाँधीवादी सिद्धांतों से क्‍या कोई नया मानव-केंद्रित सामाजिक परिवर्तन संभव है?”

मेरे सामने एक और कविता आ गई :

हम जिस शान्ति के लिए रेंगते रहे

वो शान्ति बाघों के जबड़ों में

स्‍वाद बनकर टपकती रही।

शान्ति कहीं नहीं होती —

रूहों में छिपे गीदड़ों का हुआना ही सबकुछ है।

शान्ति

घुटनों में सिर देकर जिंदगी को सपने में देखने का यत्‍न है।

शान्ति यूं कुछ नहीं है।

शान्ति गलीज विद्वानों के मुंह से टपकती लार है

शान्ति पुरस्‍कार लेते कवियों के बढ़े हुए बाजूओं का टुण्‍ड है

शान्ति वजीरों के पहने हुए खद्दर की चमक है

शान्ति और कुछ नहीं है

या शान्ति गाँधी का जांघिया है

जिसकी तनियों को चालीस करोड़ लोगों को फांसी लगाने के लिए

प्रयुक्‍त किया जा सकता है

(कविता का शीर्षक — युद्ध और शांति)

 

मैं : ”यही नहीं इसे आजादी की दूसरी लड़ाई और नई क्रांति भी कहा जा रहा है?”

 

पाश : (इस बार वे स्‍वयं कविता पढ़ रहे थे…)

 

”क्रांति कोई दावत नहीं, नुमाइश नहीं

मैदान में बहता दरिया नहीं

वर्गों का, रुचियों का दरिन्‍दाना भिड़ना है

मरना है, मारना है

और मौत को खत्‍म करना है।

(कविता का शीर्षक — खुला खत)”

 

मैं : ”इस तरह तो आप इस आंदोलन की सारी बातों की ही खारिज नहीं कर रहे हैं?”

 

पाश :

”अभी मैं धरती पर छाई

किसी साझी के काले-स्‍याह होंठों जैसी रात की ही बात करूंगा

उस इतिहास की

जो मेरे बाप के धूप से झुलसे कंधों पर उकरा है

या अपनी मां के पैरों में फटी बिवाइयों के भूगोल की बात करूंगा

मुझसे आस मत रखना कि मैं खेतों का पूत होकर

तुम्‍हारे जुगाले हुए स्‍वादों की बात करूंगा”

(कविता का शीर्षक — इन्‍कार)

 

मैं : ”पूरा मीडिया मानो इस आंदोलन के समर्थन में जी-जान से जुटा हुआ है!!!”

 

पाश :

”वे संपादक और उस जैसे हजारों लोग

अपनी भद्दी देह पर सवार होकर आते हैं

तो गांव की पगडंडियों पर

घास में से हरी चमक मर जाती है

 

यह लोग असल में रोशनी के पतंगों जैसे हैं

जो दीया जलाकर पढ़ रहे बच्‍चों की नासिकाओं में

कचायंध का भभूका बनकर चढ़ते हैं।

मेरे शब्‍द उस दीये में

तेल की जगह जलना चाहते हैं

मुझे कविता का इससे बेहतर इस्‍तेमाल नहीं पता…”

(कविता का शीर्षक — तुझे नहीं पता)

 

मैं : ”अन्‍ना के अलावा मानो कोई खबर ही नहीं बची हो!!!”

 

पाश :

”मैं आजकल अखबारों से बहुत डरता हूं

जरूर उनमें कहीं न कहीं

कुछ न होने की खबर छपी होगी।

शायद तुम नहीं जानते, या जानते भी हों

कि कितना भयानक है कहीं भी कुछ न होना

लगातार नजरों का हांफते रहना

और चीजों का चुपचाप लेटे रहना किसी ठंडी औरत की तरह।”

(कविता का शीर्षक — लड़े हुए वर्तमान के रूबरू)

 

मैं : ”मुझे जिस बात ने बेहद परेशान किया वह यह कि इसके समर्थक किसी तर्क, सवाल या संदेह को सुनना ही नहीं चाहते। ऐसा करने वाले को देशद्रोही कह दिया जाता है।”

 

पाश : यह भी कोई नई बात नहीं है। इसे सुनो :

”अपने लोगों से प्‍यार का अर्थ

‘दुश्‍मन देश’ की एजेण्‍टी होता है।

और

बड़ी से बड़ी गद्दारी का तमगा

बड़े से बड़े रुतबा हो सकता है

तो —

दो और दो तीन भी हो सकते हैं।

वर्तमान मिथिहास हो सकता है।

मनुष्‍य की शक्‍ल भी चमचे जैसी हो सकती है।”

(कविता का शीर्षक — दो और दो तीन)

 

मैं : ”और ये ‘इन्‍कलाब जिंदाबाद’ के क्‍या अर्थ बताए जा रहे है? मैं तो इसका एक ही अर्थ जानता हूं जिसे भगतसिंह ने बताया था।”

 

पाश :

”यह शर्मनाक हादसा हमारे साथ ही होना था

कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्‍द ने

बन जाना था सिंहासन का खड़ाऊं

मार्क्‍स का सिंह जैसा सिर

दिल्‍ली के भूलभुलैयों में मिमियाता फिरता

हमें ही देखना था

मेरे यारो, यह कुफ्र हमारे समयों में होना था…”

(कविता का शीर्षक — हमारे समय में)

 

मैं : ”यानी आज भी भगतसिंह के रास्‍ते से लड़ने के सिवा और कोई चारा नहीं है, ना?”

”युद्ध हमारे बच्‍चों के लिए गेंद बनकर आयेगा

युद्ध हमारी बहनों के लिए कढ़ाई के सुंदर नमूने लायेगा

युद्ध हमारी बीवियों के स्‍तनों में दूध बनकर उतरेगा

युद्ध बूढ़ी मां के लिए निगाह की ऐनक बनेगा

युद्ध हमारे बड़ों की कब्रों पर फूल बनकर खिलेगा

वक्‍त बहुत देर

किसी बेकाबू घोड़े जैसा रहा है

जो हमें घसीटता हुआ जिंदगी से बहुत दूर ले गया है

कुछ नहीं बस युद्ध ही इस घोड़े की लगाम बन सकेगा

बस युद्ध ही इस घोड़े की लगाम बन सकेगा।”

(कविता का शीर्षक — युद्ध और शांति)

 

 

इसके बाद ‘प्‍यार,’ ‘दोस्‍ती,’ ‘लड़ाई,’ ‘कॉमरेड,’ ‘जिंदगी,’ ‘मौत,’ ‘तूफान,’ जैसे ढेरों शब्‍द गूंजते रहे और भुलाए जा रहे बिंब उभरते रहे… आँख खुली तो खिड़की से धूप की रस्‍सी नींद को खींचकर दूर लिए जा रही थी… उठने का जतन कर ही रहा था कि ध्‍यान गया कि सीने पर पाश की किताब खुली थी और एक कविता मेरी आँखों में झाँक रही थी :

 

”मेरे दोस्तो,

हमारे समय का इतिहास

बस यही न रह जाये

कि हम  धीरे-धीरे मरने को ही

जीना समझ बैठें

कि हमारा समय घड़ी के साथ नहीं

हड्डियों के गलने-खपने से नापा जाए…”

(कविता का शीर्षक — हमारे वक्‍तों में)

पोस्‍ट किया गया, द्वारा : संदीप at Saturday, August 27, 2011

http://shabdonkiduniya.blogspot.com/2011/08/blog-post_4406.html

पाश का आदेश- ( अजित कुमार आजाद )

Posted in Paash-in Hindi, Paash-Poems about Paash with tags , , , , on December 6, 2011 by paash

पाश का आदेश

रात अभी भींगी नहीं थी
मेरी आंख लगी ही थी
कि पाश का तमतमाया चेहरा मेरे सामने उभरा
मैं उठकर
अपने दांये हाथ की मुट्ठी उपर उठाकर
कर ही रहा था अभिवादन
कि वह गरजे-
कहां है मेरा लोहा
जो मैंने दिया था तुम्हें हथियार के लिए

मैंने तकिये के नीचे से
एक कील और एक चाकू बढ़ाया उनकी ओर
उन्होंने फिर पूछा-
थोड़ा लोहा और होगा
-हां, उसकी बनी बन्दूक वहां टंगी है, दीवार पर

पाश ने पलटकर बन्दूक उतारी
उसे चूमा
उस पर जमी धूम झाड़ी
उसे खोल कर देखा और पूछा
इसकी गोली-
मैंने कहा-
बड़े भाई, गोली भी बना सकता था मैं
लेकिन कई सालों से नाजिम हिकमत
नहीं दे गये हैं बारुद
नेरूदा भी नहीं आये हैं कई सालों से

कुछ क्षण के लिए तो
उनके जैसा लोहे का आदमी भी रह गया था स्तब्ध
लेकिन पाश ने बन्दूक सौंपते हुए कहा-
बारूद नहीं है, शब्द तो हैं न
उसी में भरो आग
और सुनो, किसी भी कीमत पर युद्ध जारी रहनी चाहिये
मैंने आश्वस्त किया उन्हें-
हां भाई, जारी रहेगा युद्ध
और तबसे आज तक सो नहीं पाया हूं मैं

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अजित कुमार आजाद मैथिली साहित्य-संस्कृति के होलटाइमर लेखक संस्कृतिकर्मी हैं। वे साहित्य संस्कृति के इतने अनिवार्य नाम हैं कि उन्होंने अपने जीवन में इस कर्म से कभी समझौता नहीं किया। अरसा बाद उनका मुख्य संकलन ‘अघोषित युद्ध की भूमिका’ का हिन्दी अनुवाद साया हुआ है। समकालीन जीवन, इतिहास और परम्परा को देखने की अजीत की हुनरमंदी बेमिसाल है।

http://www.biharkhojkhabar.com/?p=2018

इन सपनों का क्या करें?

Posted in Paash-in Hindi with tags , on December 6, 2011 by paash

इन सपनों का क्या करें?

विनोद वर्मा | सोमवार, 11 जनवरी 2010,

कवि पाश ने कहा था, ‘सबसे ख़तरनाक होता है सपनों का मर जाना…’

एक बच्चा उड़ीसा के जंगलों में मिला था. 11-12 साल का. उसने बताया कि उसका पिता किसान है. और उत्सुकतावश पूछा कि किसान यानी? तो उसने मासूमियत से कहा, ग़रीब आदमी. वह बच्चा नक्सलियों के साथ रहता और घूमता फिरता है. एके-47 से लेकर पिस्टल तक सब कुछ चलाता है. वह बड़ा होकर नक्सली बनना चाहता है. उसका कहना है कि अपने लोगों का भला ऐसे ही हो सकता है.

एक बच्चा बलिया में मिला. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के गुज़र जाने के बाद, उनके बंगले की रखवाली करता हुआ. वह दस साल का रहा होगा. पान मसाला खाते हुए वह बताता है कि एक दिन वह अपने बड़े भाई के दुश्मनों को चाकू मारना चाहता है और कट्टा हासिल करके वह अपने नेताजी के लिए काम करना चाहता है. इस काम में उसे रुतबा दिखाई देता है.

एक बच्ची मुज़फ़्फ़रपुर के रेडलाइट एरिया में मिली. उम्र बमुश्किल आठ साल. यह जानने के बाद कि मैं दिल्ली में रहता हूँ, उसने उत्सुकता के साथ कहा कि एक दिन वह मुंबई जाना चाहती है. करना वही चाहती है, जो उसकी माँ मुज़फ़्फ़रपुर में करती है. वह कहती है कि इस काम में उसे कोई बुराई नहीं दिखती, लेकिन यह शहर ख़राब है.

एक बच्चा दिल्ली के बड़े स्कूल में पढ़ता है. आठवीं कक्षा में. डिस्कवरी चैनल पर ‘फ़्यूचर वेपन’ यानी भविष्य के हथियार कार्यक्रम को चाव से देखता है. वह एक दिन सबसे ज़्यादा तेज़ी से गोली चलाने वाले बंदूक का आविष्कार करना चाहता है. उसका तर्क है कि गोलियों से आख़िर बुरे लोग ही तो मारे जाते हैं.

पाश की कविता अक्सर लोगों को रोमांचित करती है. लेकिन इन बच्चों के सपने सुनकर तो रूह काँप जाती है.

क्या इन सपनों को भी ज़िन्दा रखा जाए?

http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2010/01/post-67.html

Paash and Shaheed Bhagat Singh

Posted in Paash-in Hindi, Shaheed Bhagat Singh on November 14, 2011 by paash

Uday Prakash’s poem (In Memory of Safdar Hashmi)

Posted in Paash-in Hindi, Paash-Poems about Paash with tags , , , , on October 10, 2011 by paash

Safdar Hashmi was a Communist  playwright, actor, director, lyricist, and theorist, chiefly associated with  Street Theatre, in India, and is still considered an important voice in political theatre in India.

He was a founding member of Jana Natya Manch (People’s Theatre Front; Janam for short) in 1973, which grew out of the Indian People’s Theatre Association (IPTA). He was brutally murdered in Delhi while performing a street play, Halla Bol.

Uday Prakash’s poem in Hindi on the brutal murder of of safdar Hashmi.

In memory of Safdar-uday parkash

ਪਾਸ਼-ਤੁਫਾਨ ਕਭੀ ਮਾਤ ਨਹੀਂ ਖਾਤੇ (ਹਿੰਦੀ ਅਨੁਵਾਦ)

Posted in Paash-in Hindi on August 1, 2011 by paash

ਚਮਨ ਲਾਲ ਜੀ ਦੁਆਰਾ ਪਾਸ਼ ਦੀਆਂ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਦੇ ਹਿੰਦੀ ਅਨੁਵਾਦ (ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਕ : ਇਤਿਹਾਸ ਬੋਧ, ਇਲਾਹਾਬਾਦ)

Tufan kabhi maat nahin khate