Archive for the Shaheed Bhagat Singh Category

ਪਾਸ਼ ਦੇ ਪਿੰਡ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਸਮਾਗਮ

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Saturday, March 24, 2012

ਪਾਸ਼ ਦੇ ਪਿੰਡ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਸਮਾਗਮ

 

ਲੋਕ ਮੋਰਚਾ ਪੰਜਾਬ

 

ਪਾਸ਼ ਦੇ ਪਿੰਡ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਸਮਾਗਮ

ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ, ਰਾਜਗੁਰੂ, ਸੁਖਦੇਵ ਅਤੇ ਚੋਟੀ ਦੇ ਇਨਕਲਾਬੀ ਕਵੀ ਅਵਤਾਰ ਪਾਸ਼ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਜਿਗਰੀ ਦੋਸਤ ਹੰਸ ਰਾਜ ਦੀ ਯਾਦ ’ਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਜੱਦੀ ਪਿੰਡ ਤਲਵੰਡੀ ਸਲੇਮ ਵਿਖੇ ਹੋਏ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਸਮਾਗਮ ਵਿਚ ਅਮਰ ਸ਼ਹੀਦਾਂ ਦੀ ਸੋਚ ਦਾ ਬਰਾਬਰੀ ਭਰਿਆ ਸਮਾਜ ਸਿਰਜਣ ਲਈ ਲੋਕ-ਸੰਗਰਾਮ ਜਾਰੀ ਰੱਖਣ ਦਾ ਸੱਦਾ ਦਿੱਤਾ।

ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਦੀ ਸ਼ਹਾਦਤ ਦੇ 81 ਵਰ੍ਹੇ ਅਤੇ ਨਾਮਵਰ ਕਵੀ ਪਾਸ਼ ਦੀ ਸ਼ਹਾਦਤ ਨੂੰ 22 ਵਰ੍ਹੇ ਬੀਤ ਜਾਣ ’ਤੇ ਲੋਕਾਂ ਅੰਦਰ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਵਿਚਾਰਾਂ ਅਤੇ ਆਦਰਸ਼ਾਂ ਦਾ ਜਲੌਅ ਨਾਲ ਲੱਗਦੇ ਪਿੰਡਾਂ ਤੋਂ ਔਰਤਾਂ, ਮਰਦਾਂ ਅਤੇ ਬੱਚਿਆਂ ਦੇ ਆਕਾਸ਼ ਗੰਜਾਊ ਨਾਅਰੇ ਲਾਉਦੇ ਪੰਡਾਲ ਵਿਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋਏ ਜੱਥਿਆਂ ਤੋਂ ਦੇਖਿਆਂ ਹੀ ਬਣਦਾ ਸੀ।

 

 

ਛਤੀਸਗੜ੍ਹ ਆਦਿਵਾਸੀਆਂ ਦੇ ਹੱਕਾਂ ਲਈ ਚੱਲ ਰਹੇ ਸੰਗਰਾਮ ਦੇ ਅਖਾੜੇ ’ਚੋਂ ਆਏ ਮੁਲਕ ਦੇ ਜਾਣੇ-ਪਹਿਚਾਣੇ ਬੁੱਧੀਜੀਵੀ ਅਤੇ ਸਮਾਜ-ਸੇਵੀ ਹਿਮਾਂਸ਼ੂ ਕੁਮਾਰ ਨੇ ਇਸ ਮੌਕੇ ਭਾਵੁਕ ਅੰਦਾਜ਼ ’ਚ ਤਸਵੀਰਾਂ ਅਤੇ ਮੂੰਹ ਬੋਲਦੇ ਤੱਥਾਂ ਨਾਲ ਸਮਿਆਂ ਦੇ ਹਾਕਮਾਂ ਅੱਗੇ ਸੁਆਲ ਰੱਖੇ ਕਿ ਜੰਗਲ, ਜਲ, ਜ਼ਮੀਨ, ਕੁਦਰਤੀ ਖਣਿਜ ਪਦਾਰਥ ਹੜੱਪਣ ਲਈ ਬਹੁਕੌਮੀ ਕੰਪਨੀਆਂ ਦੀ ਪਿੱਠ ਥਾਪੜਨਾ ਅਤੇ ਔਰਤਾਂ ਦੀ ਇੱਜ਼ਤ ਨਾਲ ਖੇਡਣਾ, ਉਜਾੜਨਾ, ਵਹਿਸ਼ੀਆਨ ਜ਼ੁਲਮ ਚਾਹੁਣਾ ਕਿਹੜੇ ਵਿਕਾਸ ਅਤੇ ਜਮਹੂਰੀਅਤ ਦੀ ਨਿਸ਼ਾਨੀ ਹੈ?

 

 

ਹਿਮਾਂਸ਼ੂ ਕੁਮਾਰ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਕੋਲੋਂ ਵੀ ਜ਼ਮੀਨਾਂ, ਪਾਣੀ, ਬਿਜਲੀ, ਰੁਜ਼ਗਾਰ, ਸਿੱਖਿਆ ਅਤੇ ਸਿਹਤ ਆਦਿ ਉਪਰ ਝਪਟਣ ਦਾ ਸਿਲਸਲਾ ਤੇਜ਼ ਕੀਤਾ ਜਾਏਗਾ ਇਸਦਾ ਇਕੋ ਇਕ ਜਵਾਬ ਚੁਣੌਤੀਆਂ ਨੂੰ ਸਿੱਧੇ ਮੱਥੇ ਟਕਰਨਾ ਹੈ।

 

ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਸੂਬਾਈ ਆਗੂ ਹਰਮੇਸ਼ ਮਾਲੜੀ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿਰਤੀਆਂ, ਕਿਸਾਨਾਂ, ਨੌਜਵਾਨ, ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ, ਦਸਤਕਾਰਾਂ ਅਤੇ ਔਰਤਾਂ ਨੂੰ ਮੋਢੇ ਸੰਗ ਮੋਢਾ ਜੋੜ ਕੇ ਜੂਝਣਾ ਪੈਣਾ ਹੈ ਕਿਉਕਿ ਨਵੀਆਂ ਲੋਕ-ਮਾਰੂ ਨੀਤੀਆਂ ਦੇ ਦੰਦੇ ਸੂਬਾਈ ਅਤੇ ਕੇਂਦਰੀ ਸਰਕਾਰ ਤਿੱਖੇ ਕਰ ਰਹੀਆਂ ਹਨ।

 

ਲੋਕ ਮੋਰਚਾ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਅਮੋਲਕ ਸਿੰਘ ਨੇ ਸ਼ਹੀਦਾਂ ਨੂੰ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਅਰਪਤ ਕਰਦਿਆਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਐਨ.ਸੀ.ਟੀ.ਸੀ., ਨਵੀਂ ਜਲ ਨੀਤੀ, ਨਵੀਂ ਦਰਾਮਦ-ਬਰਾਮਦ ਕੀਤੀ ਅਤੇ ਅਸ਼ਲੀਲ ਸਭਿਆਚਾਰਕ ਹੱਲੇ ਦਾ ਮੂੰਹ ਮੋੜਨ ਲਈ ਹਾਕਮ ਧੜਿਆਂ ਖਿਲਾਫ ਲੋਕ ਧੜੇ ਦਾ ਮਜ਼ਬੂਤ ਕਿਲਾ ਉਸਾਰਨਾ ਹੀ ਇਕੋ ਇਕ ਸਵੱਲੜਾ ਰਾਹ ਹੈ।

ਕੈਨੇਡਾ ਤੋਂ ਆਏ ਪਾਸ਼ ਦੇ ਸਾਹਿਤਕ ਸੰਗੀ ਇਕਬਾਲ ਰਾਮੂਵਾਲੀਆ ਨੇ ਵਿਚਾਰਾਂ ਅਤੇ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਦੇ ਗੁਲਦਸਤੇ ਨਾਲ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਭੇਟ ਕੀਤੀ ਅਤੇ ਅਮੁੱਲੀਆਂ ਯਾਦਾਂ ਸਾਂਝੀਆਂ ਕੀਤੀਆਂ।

 

 

 

ਇਕਬਾਲ ਰਾਮੂਵਾਲੀਆ ਨੇ ਪਾਸ਼ ਦੇ ਪਿਤਾ ਮੇਜਰ ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਕੈਲੋਫੋਰਨੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਭੇਜਿਆ ਸੁਨੇਹਾ ਵੀ ਪੜ੍ਹਿਆ ਜਿਸ ਵਿਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਪਾਸ਼ ਦੀ ਕਾਵਿ-ਸਿਰਜਣਾ ਉਪਰ ਮਾਣ ਕਰਦਿਆਂ ਆਵਾਮ ਨੂੰ ਸ਼ਹੀਦਾਂ ਦੇ ਰਾਹ ’ਤੇ ਤੁਰਨ ਦੀ ਅਪੀਲ ਕੀਤੀ।

 

 

ਨਵਚਿੰਤਨ ਕਲਾ ਮੰਚ ਬਿਆਸ (ਹੰਸਾ ਸਿੰਘ) ਵੱਲੋਂ ਹਰਮੇਸ਼ ਮਾਲੜੀ ਦਾ ਨਾਟਕ ‘ਹਨੇਰੇ-ਚਾਨਣੇ’ ਖੇਡਿਆ। ਮਾਸਟਰ ਅਵਤਾਰ ਅਤੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤਪਾਲ ਬੰਗੇ ਨੇ ਗੀਤਾਂ ਦਾ ਰੰਗ ਭਰਿਆ। ਹਿਮਾਂਸ਼ੂ ਕੁਮਾਰ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਜੀਵਨ ਸਾਥਣ ਵੀਨਾ ਭੱਲਾ, ਮੋਨੀਕਾ ਅਤੇ ਪਰਿਵਾਰ ਦਾ ਸਨਮਾਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ।

 

ਪਾਸ਼ ਹੰਸ ਰਾਜ ਯਾਦਗਾਰ ਕਮੇਟੀ ਵੱਲੋਂ ਆਯੋਜਿਤ ਇਸ ਸਮਾਗਮ ’ਚ ਹੰਸ ਰਾਜ ਦੇ ਭਰਾ ਹਰਬੰਸ ਨਿਊਜ਼ੀਲੈਂਡ ਅਤੇ ਪਾਸ਼ ਯਾਦਗਾਰੀ ਕੌਮਾਂਤਰੀ ਟਰੱਸਟ ਦੇ ਕਨਵੀਨਰ ਸੁਰਿੰਦਰ ਧੰਜਲ (ਕੈਨੇਡਾ) ਵੱਲੋਂ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਅਤੇ ਭਾਵਨਾਵਾਂ ਵੀ ਸਾਂਝੀਆਂ ਕੀਤੀਆਂ ਗਈਆਂ।

 

ਅਮੋਲਕ ਸਿੰਘ

94170-76735

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Paash poster

Posted in Paash posters, Shaheed Bhagat Singh on March 21, 2012 by paash

ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਬਾਰੇ-ਪਾਸ਼

Posted in Paash-in Punjabi(Gurmukhi), Shaheed Bhagat Singh on March 21, 2012 by paash

23 ਮਾਰਚ ਦੇ ਸ਼ਹੀਦਾਂ ਦੀ ਯਾਦ ‘ਚ ਸਮਾਗਮ

Posted in Forthcoming events, Paash-23rd March 1988, Paash-Life and Times, Paash-News Items, Paash-Pash Memorial International Trust, Shaheed Bhagat Singh on March 21, 2012 by paash

ਪਾਸ਼-ਹੰਸ ਰਾਜ ਯਾਦਗਾਰੀ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਸਮਾਗਮ 23 ਮਾਰਚ 2012 ਨੂੰ ਤਲਵੰਡੀ ਸਲੇਮ ਵਿਖੇ

Posted in Paash-23rd March 1988, Paash-In Memory of Paash, Paash-News Items, Paash-Pash Memorial International Trust, Shaheed Bhagat Singh on March 17, 2012 by paash

 

http://epaper.punjabijagran.com/27880/Jalandhar/Jalandhar-Punjabi-jagran-News-6th-March-2012#page/16/1

भगत सिंह और पाश की याद में

Posted in Paash-In Memory of Paash, Shaheed Bhagat Singh on January 11, 2012 by paash

भगत सिंह और पाश की याद में

By विशेष प्रतिनिधि on May 29, 2011

शहीद भगत सिंह व कवि अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की शहादत दिवस पर 23 मार्च 2011 को क्रांतिकारी जनवादी मोर्चा उत्तराखंड इकाई के तत्वावधान में ‘उत्तराखंड राज्य: दशा व दिशा’ विषय पर पर्वतीय सांस्कृतिक परिषद, पैठ पड़ाव रामनगर में एक कन्वेंशन सम्पन्न हुई। इस चर्चा में उभर कर आया कि राज्य बने एक दशक हो जाने के बावजूद जनता की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। माफियाओं-तस्करों का वर्चस्व बढ़ा है और प्राकृतिक संसाधन को काॅरपोरेट घरानों के हवाले कर दिया गया है। महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, पलायन विस्थापन जैसी समस्याओं से त्रस्त हैं। परेशान जनता जब आक्रोश व्यक्त करती है, तो शासन-प्रशासन दमन पर उतर आता है। सरकार किसी भी प्रकार की असहमति बर्दाश्त नहीं सुनना चाहती। वक्ताओं ने कहा सही मायने में जनता के उत्तराखंड के निर्माण के लिये एक मजबूत जन आंदोलन की जरूरत है।

कन्वेंशन को एल.एम.पाण्डे, महिला मंच की ललिता, हेम शर्मा, क्रालोस के मुनीष, आर.डी.एफ. के कुन्दन कोरंगा, सी.आर.पी.पी. के कंचन जोशी, उत्तराखंड जागरण के सम्पादक सतेन्द्र रावत, उलोवा के डॉ. डी.के काण्डपाल, पी.एस.एफ. के सुरेन्द्र चौहान, आई.एम.के. के सुरेन्द्र आर.डी.एम. के दिगम्बर पूजा सहित कई अनेक लोगों ने संबोधित किया। अध्यक्षता उत्तराखंड लोक वाहिनी के अध्यक्ष डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट, वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी व राजेन टोडरिया, प्रो. प्रभात उप्रेती तथा आर.डी.एफ. के अध्यक्ष जीवन चन्द्र ने संयुक्त रूप से की। संचालन आर.डी.एफ. प्रदेश सचिव कैसर राजा ने किया।

प्रस्तावों में पारित किया गया कि पर्यावरण मानकों के अनुसार प्रत्येक राज्य में 33 प्रतिशत भू-भाग में वन होना चाहिये, लेकिन उत्तराखंड में 65 प्रतिशत भूभाग में वन है। अतः प्रदेश के 33 प्रतिशत वन भूभाग के अतिरिक्त वन भूमि को भूमिहीन किसानों में बाँटा जाये। बेरोजगारों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जायें व रोजगार न दिये जाने की स्थिति में प्रतिमाह तीन हजार रुपये न्यूनतम मासिक बेरोजगारी भत्ता दिया जाये। भू हदबंदी कानून को असरदार ढंग से लागू किया जाये तथा सीलिंग कानून के तहत प्राप्त अतिरिक्त भूमि को भूमिहीन किसानों को बाँटा जाये। सिडकुल में ठेकेदारी प्रथा को समाप्त किया जाये व श्रम कानूनों को असरदार ढंग से लागू किया जाये। सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों में ठेकेदारी प्रथा को समाप्त किया जाये तथा इन संस्थानों में कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को नियमित किया जाये। प्रदेश में निर्माणाधीन व प्रस्तावित समस्त जल विद्युत परियोजनाओं को तत्काल निरस्त किया जाये व लघु पनघट विद्युत परियोजनाओं को जन सहभागिता से बनाया जाये। नदियों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले न किया जाये तथा सेंचुरी, नेशनल पार्क के नाम पर जनता को जमीन से बेदखल करना बंद किया जाये। वन जीव संरक्षण अधिनियम, भारतीय वन अधिनियम 2001 जैसे काले कानूनों को रद्द कर जल-जंगल-जमीन पर जनता के पारम्परिक हक-हकूक बहाल किये जायें। शिक्षा का निजीकरण, बाजारीकरण तथा भगवाकरण बंद किया जाये व सबको समान शिक्षा व रोजगारपरक शिक्षा उपलब्ध करायी जाये।

http://www.nainitalsamachar.in/bhagat-singh-and-avtar-sandhu-pash-remembered/

भगत सिंह और पाश : राजनीति व संस्कृति में नया रंग भरती शहादत

Posted in Paash-In Memory of Paash, Shaheed Bhagat Singh on January 11, 2012 by paash

भगत सिंह और पाश : राजनीति संस्कृति में नया रंग भरती शहादत

 
कौशल किशोर / 23 मार्च शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का शहादत दिवस है। इन तीन नौजवान क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। इस घटना के 57 साल बाद 23 मार्च 1988 को पंजाब के प्रसिद्ध क्रांतिकारी कवि अवतार सिहं पाश को आतंकवादियों ने अपनी गोलियों का निशाना बनाया। 70 वाले दशक में पंजाब में जो क्रांतिेकारी आंदोलन शुरू हुआ, उसके पक्ष में कविताएं लिखने के कारण भी पाश कई बार जेल गये थे, सरकारी जुल्म के शिकार हुए तथा वर्षों तक भूमिगत रहे।

यह महज संयोग है कि पंजाब की धरती से पैदा हुए तथा क्रांतिकारी भगत सिंह के शहीदी दिवस के दिन ही अर्थात 23 मार्च को पंजाबी के क्रांतिकारी कवि अवतार सिहं पाश भी शहीद होते हैं। लेकिन इन दोनों क्रांतिकारियों के उददेश्य व विचारों की एकता कोई संयोग नहीं है। यह वास्तव में भारतीय जनता की सच्ची आजादी के संघर्ष की क्रांतिकारी परंपरा का न सिर्फ सबसे बेहतरीन विकास है बल्कि राजनीति और संस्कृति की एकता का सबसे अनूठा उदाहरण भी है।
भगत सिंह और उनके साथियों ने आजादी का जो सपना देखा थाए जिस संघर्ष और क्रांति का आहवान किया था, वह अधूरा ही रहा। भारतीय जनता के गौरवशाली संघर्षों और विश्व पूंजीवाद के आंतरिक संकट के परिणाम स्वरूप जो राजनीतिक आजादी 1947 में मिली, उसका लाभ केवल इस देश के पूंजीपतियोंए सामंतों और उनसे जुडे मुट्ठी भर विशेषाधिकार प्राप्त लोगों ने ही उठाया है। सातवां दशक आते.आते आजादी से मोहभंग की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। भारत के नये शासक वर्ग के खिलाफ जन असंतोष तेज होता है जिसकी सबसे ठोस और मुखर अभिव्यक्ति चैथे राष्ट्रीय आम चुनाव और नक्सलबाडी विद्रोह में होती है। विशेष तौर से नक्सलबाडी विद्रोह ने भारतीय साहित्य को काफी गहराई तक प्रभावित किया तथा व्यक्तिवाद, निषेधवाद, परंपरावाद, अस्तित्ववाद, आधुनिकतावाद जैसी जन विरोधी प्रवृत्तियों को प्रबल चुनौती दी। विकल्प की तलाश कर रही बंग्ला, तेलुगू, हिन्दी, पंजाबी आदि भाषाओं की नयी पीढी को तो जैसे राह ही मिल गयी। पंजाबी में नये कवियों की एक पूरी पीढी सामने आयी जिसने पंजाबी कविता को नया रंग.रूप प्रदान किया। अवतारसिंह पाश ऐसे कवियों की अगली पांत में थे।पाश की पहली कविता 1967 में छपी थी। अर्थात पाश ने पंजाबी साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसे दौर में प्रवेश किया जो दूसरी आजादी के क्रांतिकारी राजनीतिक संघर्ष का ही नहीं अपितु नये जनवादी.क्रांतिकारी सांस्कृतिक आंदोलन का भी प्रस्थान बिन्दु था। अमरजीत चंदन के संपादन में निकली भूमिगत पत्रिका ‘दस्तावेज’ के चैथे अंक में परिचय सहित पाश की कविताओं का प्रकाशन तो पंजाबी साहित्य के क्षेत्र में धमाके की तरह था। पाश की इन कविताओं की पंजाब के साहित्य.हलके में काफी चर्चा रही। उन दिनों पंजाब में क्रांतिकारी संधर्ष अपने उभार पर था। पाश का गांव तथा उनका इलाका इस संघर्ष के केन्द्र में था। इस संघर्ष की गतिविधियों ने पंजाब के साहित्यिक माहौल में नयी ऊर्जा व नया जोश भर दिया था। पाश ने इसी संघर्ष की जमीन पर कविताएं रचीं और इसके जुर्म में गिरफ्तार हुए और करीब दो वर्षों तक जेल में रहे। सत्ता के दमन का मुकाबला करते हुए जेल में ढेरों कविताएं लिखीं और जेल में रहते उनका पहला कविता संग्रह लोककथा प्रकाशित हुआ। इस संग्रह ने पाश को पंजाबी कविता में उनकी पहचान दर्ज करा दी।
1972 में जेल से रिहा होने के बाद पाश ने सिआड नाम से साहित्यिक पत्रिका निकालनी शुरू की। नक्सलबाडी आंदोलन पंजाब में बिखरने लगा था। साहित्य के क्षेत्र में भी पस्ती व हताशा का दौर शुरू हो गया था। ऐसे वक्त में पाश ने आत्मसंघर्ष करते हुए पस्ती व निराशा से उबरने की कोशिश की तथा सरकारी दमन के खिलाफ व जन आंदोलनों के पक्ष में रचनाएँ की। पंजाब के लेखकों.संस्कृतिकर्मियों को एकजुट व संगठित करने का प्रयास चलाते हुए पाश ने पंजाबी साहित्य.सभ्याचार मंच का गठन किया तथा अमरजीत चंदन, हरभजन हलवारही आदि के साथ मिलकर हेमज्योति पत्रिका शुरू की। इस दौर की पाश की कविताओं में भावनात्मक आवेग की जगह विचार व कला की ज्यादा गहराई थी। चर्चित कविता युद्ध और शांति पाश ने इसी दौर में लिखी। 1974 में उनका दूसरा कविता संग्रह ‘उडडदे बाजा मगर’ छपा जिसमें उनकी 38 कविताएं संकलित हैं। पाश का तीसरा संग्रह ‘साडे समियां विच’ 1978 में प्रकाशित हुआ। इसमें अपेक्षाकृत कुछ लम्बी कविताएं भी संग्रहित हैं। उनकी मृत्यु के बाद ‘लड़ेंगे साथी’ शीर्षक से उनका चैथा संग्रह सामने आया जिसमें उनकी प्रकाशित व अप्रकाशित कविताएँ संकलित हैं।
पाश की कविताओं का मूल स्वर राजनीतिक.सामाजिक बदलाव का अर्थात क्रांति और विद्रोह का है। इनकी कविताएं धारदार हैं। जहाँ एक तरफ सांमती.उत्पीडकों के प्रति जबरदस्त गुस्सा व नफरत का भाव है, वहीं अपने जन के प्रति, क्रांतिकारी वर्ग के प्रति अथाह प्यार है। नाजिम हिकमत और ब्रतोल्त बे्रख्त की तरह इनकी कविताओं में राजनीति व विचार की स्पष्टता व तीखापन है। कविता राजनीतिक नारा नहीं होती लेकिन राजनीति नारे कला व कविता में घुल.मिलकर उसे नया अर्थ प्रदान करते हैं तथा कविता के प्रभाव और पहुंच को आश्चर्यजनक रूप में बढाते हैं.. यह बात पाश की कविताओं में देखी जा सकती हैं। पाश ने कविता को नारा बनाये बिना अपने दौर के तमाम नारों को कविता में बदल दिया।
पाश की कविताओं की नजर में एक तरफ शांति गांधी का जांघिया है जिसका नाड़ा चालीस करोड़ इन्सानों की फाँसी लगाने के काम आ सकता है’ और ‘शब्द जो राजाओं की घाटियों में नाचते हैं, प्रेमिका की नाभि का क्षेत्रफल मापते हैं जो मेजों पर टेनिस बाल की तरह दौडते हैं और जो मैचों की ऊसर जमीन पर उगते हैं, कविता नहीं होतें तो दूसरी तरफ ‘युद्ध हमारे बच्चों के लिए कपड़े की गेंद बनकर आएगा/ युद्ध हमारी बहनों के लिए कढाई के सुन्दर नमूने लायेगा/ युद्ध हमारी बीवियों के स्तनों में दूध बनकर उतरेगा/ युद्ध बूढी माँ के लिए नजर का चश्मा बनेगा/ युद्ध हमारे पुरखों की कब्रों पर फूल बनकर खिलेगा’ और ‘तुम्हारे इंकलाब में शामिल है संगीत और साहस के शब्द/ खेतों से खदानं तक युवा कंधों और बलिष्ठ भुजाओं से रचे हुए शब्द, बर्बर सन्नाटों को चीरते हजार कंठों से निकलकर आज भी एक साथ गूंज रहें शब्द’ हजारों कंठो से निकली हुई आवाज ही पाश की कविता में शब्दबद्ध होती है। पाश की कविताओं में इन्हीं कंठों की उष्मा है। इसीलिए पाश की कविताओं पर लगातार हमले हुए हैं। पाश को अपनी कविताओं के लिए दमित होना पडा है। बर्बर यातनाएं सहनी पडी हैं। यहाँ तक कि अपनी जान भी गवांनी पड़ी हैं। लेकिन चाहे सरकारी जेंलें हों या आतंकवादियों की बन्दूकें………. पाश ने कभी झुकना स्वीकार नहीं किया बल्कि हजारों दलित.पीड़ित शोषित कंठों से निकली आवाज को अपनी कविता में पिरोते रहेए रचते रहेए उनका गीत गाते रहे और अपने प्रिय शहीद भगत सिंह की राह पर चलते हुए शहीद हो गये।
23 मार्च के दिन ही अपना खून बहाकर पाश ने राजनीति और संस्कृति के बीच खडी की जाने वाली दीवार को ढहाते हुए यह साबित कर दिया कि बेहतर जीवन मूल्यों व शोषण उत्पीड़न से मुक्त मानव समाज की रचना के संघर्ष में कवि व कलाकार भी उसी तरह का योद्धा है जिस तरह एक राजनीतिककर्मी या राजनीतिक कार्यकर्तां। राजनीति और संस्कृति को एकरूप करते हुए पाश ने यह प्रमाणित कर दिया कि अपनी विशिष्टता के बावजूद मानव समाज के संघर्ष में राजनीति और संस्कृति को अलगाया नहीं जा सकता बल्कि इनकी सक्रिय व जन पक्षधर भूमिका संघर्ष को न सिर्फ नया आवेग प्रदान करती है बल्कि उसे बहुआयामी भी बनाती है।
भगत सिंह मूलत एक राजनीतिक कार्यकर्ता थे। राजनीति उनका मुख्य क्षेत्र था। लेकिन उन्होंने तमाम सामाजिक.सांस्कृतिक साहित्यिक सवालों पर भी अपनी सटीक टिप्पणी पेश की थी। अपने दौर में ब्रिटिश साम्राज्यवादियों, देशी विदेशी प्रतिक्रियावादी शाक्तियों व विचारों, धार्मिक कठमुल्लावादीए सांप्रदायिकता, अस्पृश्यता, जातिवाद जैसे मानव विरोधी मूल्यों के खिलाफ संघर्ष करते हुए भगत सिंह ने जनवादी.समाजवादी विचारों को प्रतिष्ठित किया। पाश की कविता, विचारधारा, पत्रकारिता व सांस्कृतिक सक्रियता से साफ पता चलता है कि उनकी राजनीतिक समझ बहुत स्पष्ट थी।
यही भगत सिंह और पाश की समानता है। भले ही इनकी शहादत के बीच 57 वर्षों का अंतर है। ये दोनों क्रांतिकारी योद्धा राजनीति और संस्कृति की दुनिया को बहुत गहरे प्रभावित करते है साथ ही ये राजनीति और संस्कृति की एकता, पंजाब की धर्मनिरपेक्ष, जनवादी व क्रांतिकारी परंपरा के उत्कृष्ट वाहक हैं तथा अपनी शहादत से ये राजनीति और संस्कृति की एकता में नया रंग भरते हैं।

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