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गुरुशरण सिंह होने का मतलब

Posted in Gursharan Singh, Indian People's Theatre Association, marxism, Paash-in Hindi, Paash-Life and Times, Shaheed Bhagat Singh with tags , , on December 6, 2011 by paash

Saturday, 01 October 2011

गुरुशरण सिंह होने का मतलब

1980 के दशक में गुरुशरण सिंह ने सांस्कृतिक आंदोलन को संगठित करने के प्रयास में उत्तर प्रदेशबिहार सहित कई राज्यों का दौरा किया. उनकी नाटक टीमें बिहार के पटना भोजपुर के किसान आंदोलन के संघर्ष के इलाकों में गईं. उत्तर प्रदेश के तराई के क्षेत्र जैसे पूरनपुरपीलीभीतबिन्दुखताहल्द्वानीकाशीपुर में उनके नाट्य प्रदर्शन हुए. इसी क्रम में वे कई बार लखनऊ भी आये. उन्होंने लखनऊ के एवेरेडी फैक्ट्री गेट, उत्तर रेलवे के मंडल कार्यालय के प्रांगण रेलवे इंस्टीच्यूटजनपथ मार्केट सहित सड़को नुक्कड़ों पर गड्ढा’, ‘जंगीराम की हवेली’, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और फैज जगमोहन जोशी के गीतों के द्वारा जो सांस्कृतिक लहर पैदा कीवह आज भी हमें याद है 

कौशल किशोर

भगत सिंह के जन्म दिवस 28 सितम्बर के दिन मशहूर नाटककार गुरुशरण सिंह का निधन हुआ. शहीद भगत सिंह के शहादत दिवस यानी 23 मार्च के दिन ही पंजाबी के क्रान्तिकारी कवि अवतार सिंह पाश आतंकवादियों के गोलियों के निशाना बनाये गये थे. यह सब संयोग हो सकता है. लेकिन पंजाब की धरती पर पैदा हुए पाश और गुरुशरण सिंह द्वारा भगत सिंह के विचारों और उनकी परम्परा को आगे बढ़ाना कोई संयोग नहीं है. भगत सिंह ने शोषित उत्पीडि़त मेहनतकश जनता की मुक्ति में जिस नये व आजाद हिन्दुस्तान का सपना देखा था, उसी संघर्ष को आगे बढ़ाने वाले ये सांस्कृतिक योद्धा रहे हैं. भगत सिंह के क्रान्तिकारी विचारों व संघर्षों को आगे बढ़ाना इनके कलाकर्म का मकसद रहा है. भले ही भगत सिंह ने इस संघर्ष को राजनीतिक हथियारों से आगे बढ़ाया, वहीं पाश ने यही काम कविता के द्वारा तथा गुरुशरण सिंह ने ताउम्र अपने नाटकों से किया. गुरुशरण सिंह के निधन पर उनकी बेटियों की प्रतिक्रिया थी कि उन्हें अपने पिता पर गर्व है. उन्होंने अपने उसूलों के साथ कभी समझौता नहीं किया. गुरुशरण सिंह होने का मतलब भी यही है. कला को हथियार में बदल देने तथा सोद्देश्य संस्कृति कर्म का इससे बेहतरीन उदाहरण नहीं हो सकता है.

यों तो 1929 में मुल्तान में जन्मे गुरुशरण सिंह अपने छात्र जीवन में ही कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ गये थे. लेकिन एक नाटककार व संस्कृतिकर्मी के रूप में उनके रूपान्तरण की कहानी बड़ी दिलचस्प है. वे बुनियादी तौर पर विज्ञान के विद्यार्थी थे. सीमेन्ट टेक्नालाजी से एम.एस.सी. किया. पंजाब में जब भाखड़ा नांगल बाँध बन रहा था, उन दिनों वे इसकी प्रयोगशाला में बतौर अधिकारी कार्यरत थे. वहाँ राष्ट्रीय त्योहारों को छोड़कर किसी भी दिन सरकारी छुट्टी नहीं दी जाती थी. उन्हीं दिनों लोहड़ी का त्योहार आया जो पंजाब का एक महत्वपूर्ण त्योहार है. मजदूरों ने इस त्योहार पर छुट्टी की मांग की और प्रबंधकों द्वारा इनकार किये जाने पर मजदूरों ने हड़ताल कर दी.

गुरुशरण सिंह ने मजदूरों की भावनाओं को आधार बनाकर एक नाटक तैयार किया. इसे मजदूरों के बीच जगह जगह खेला गया. इस नाटक ने अच्छा असर दिखाया. यह नाटक काफी लोकप्रिय हुआ. इसमें गुरुशरण सिंह ने भी बतौर कलाकार भूमिका की. और अंततः प्रबन्धकों को झुकना पड़ा. मजदूरों की मांगें मान ली गई. इसने नाटक और कला की ताकत से गुरुशरण सिंह को परिचित कराया और इस घटना ने उन्हें नाटक लिखने, नाटक करने वालों का ग्रूप बनाने, दूसरों के लिखे नाटकों को करने या कहानियों का नाट्य रूपान्तर आदि के लिए प्रेरित किया.

गुरुशरण सिंह पंजाब में इप्टा के संस्थापकों में थे. नाट्य आंदोलन को संगठित व संस्थागत रूप देने के लिए उन्होंने 1964 में अमृतसर नाटक कलाकेन्द्र का गठन किया ताकि कलाकारों को शिक्षित प्रशिक्षित किया जाय, शौकिया कलाकार की जगह उन्हें पूरावक्ती कलाकार में बदला जाय तथा उनकी भौतिक जरूरतों को पूरा करते हुए उनके पलायन को रोका जाय. गुरुशरण सिंह के नाटको की खासियत है कि यह अपनी परम्परा के प्रगतिशील विचारों को, संघर्ष की विरासत को आगे बढ़ाता है, उसे विकसित करता है. वह इतिहास के सकारात्मक पहलुओं को तात्कालिक परिस्थितियों से जोडता है. यही कारण है कि इनके नाटक तात्कालिक होते हुए भी तात्कालिक नहीं होते बल्कि उनमें अतीत, वर्तमान और भविष्य आपस में गुथे हुए हैं.

नक्सलबाड़ी के किसान आंदोलन का गहरा असर पंजाब में भी था. उन्हीं दिनों गुरुनानक देव का 500 वाँ जन्म दिन आया. इस मौके पर गुरुशरण सिंह ने नानक के प्रगतिशील विचारों को आधार बनाकर अपने मित्र गुरुदयाल सिंह सोढ़ी के नाटक ‘जिन सच्च पल्ले होय’ को आज के सच से जोड़ते हुए प्रस्तुत किया. पंजाब में इस नाटक का अपना इतिहास है. यह नाटक आश्चर्यजनक रूप से लोकप्रिय हुआ और पंजाब के करीब 1600 गाँवों में इसका मंचन हुआ. भगत सिंह के जीवन और विचारधारा पर आधारित नाटक ‘इंकलाब जिंदाबाद’ की कहानी इससे अलग नहीं है. न सिर्फ पंजाब में बल्कि देश के शहरों से लेकर गांव गांव में इसके मंचन हुए. उनके नाटकों में लोक नाट्य रूपों व लोक शैलियों का प्रयोग देखने को मिलता है. वे मंच नाटक और नुक्कड़ नाटक के विभाजन को कृत्रिम मानते थे तथा इस तरह के विभाजन के फलसफे को नाटककारों व रंगकर्मियों की कमजोरी मानते थे. 

गुरुशरण सिंह उन लोगों में रहे जिन्होंने लागातार सत्ता के दमन को झेलते हुए सांस्कृतिक आंदोलन को आगे बढ़ाया. अपने नाटक ‘मशाल’ के द्वारा उन्होंने इंदिरा गाँधी की तानाशाही का विरोध किया था. इसकी वजह से उन्हें इमरजेन्सी के दौरान दो बार गिरफ्तार भी किया गया. अपनी प्रतिबद्धता की कीमत अपनी नौकरी गवाँकर चुकानी पड़ी. अस्सी के दशक में पंजाब के जो हालात थे तथा गुरुशरण सिंह को आतंकवादियों की ओर से जिस तरह की धमकियाँ मिल रही थी, उसने हम जैसे तमाम लोगों को गुरुशरण सिंह के जीवन की सुरक्षा को लेकर चिन्तित कर रखा था. पर गुरुशरण जी उनकी धमकियों से बेपरवाह काम करते रहे और अपनी मासिक पत्रिका ‘समता’ में आतंकवाद के विरोध में लगातार लिखते रहे. उन्हीं दिनों आतंकवाद के विरोध में उनका चर्चित नाटक ‘बाबा बोलता है’ आया. उन्होंने न सिर्फ इसके सैकड़ों मंचन किये बल्कि भगत सिंह के शहादत दिवस 23 मार्च पर आतंकवाद के विरोध में भगत सिंह के जन्म स्थान खटकन कलां से 160 किलोमीटर दूर हुसैनीकलां तक सांस्कृतिक यात्रा निकाली जिसके अन्तर्गत जगह जगह उनकी टीम ने नाटक व गीत पेश किये. यह साहस व दृढता जनता से गहरे लगाव, उस पर भरोसे तथा अपने उद्देश्य के प्रति समर्पण से ही संभव है. यह गुण हमें गुरुशरण सिंह में मिलता है. अपने इन्हीं गुणों की वजह से सरकारी दमन हो या आतंकवादियों की धमकियां, उन्होंने कभी इनकी परवाह नहीं की और सत्ता के खिलाफ समझौता विहीन संघर्ष चलाते रहे.

गुरुशरण सिंह ने करीब पचास के आसपास नाटक लिखे, उनके मंचन किये. ‘जंगीराम की हवेली’, ‘हवाई गोले’, ‘हर एक को जीने का हक चाहिए’, ‘इक्कीसवीं सदी’, ‘तमाशा’, ‘गड्ढ़ा’ आदि उनके चर्चित नाटक रहे हैं. भले ही उनके सांस्कृतिक कर्म का क्षेत्र पंजाब रहा हो, पर उनका दृष्टिकोण व्यापक व राष्ट्रीय था. वे एक ऐसे जन सांस्कृतिक आंदोलन के पक्षधर थे जो अपनी रचनात्मक ऊर्जा संघर्षशील जनता से ग्रहण करता है और इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए जनवादी व क्रान्तिकारी संस्कृतिकर्मियों के संगठन की जरूरत को वे शिद्दत के साथ महसूस करते थे. यही कारण था कि जब क्रान्तिकारी वामपंथी धारा के लेखकों व संस्कृतिकर्मियों को संगठित करने का प्रयास शुरू हुआ तो उनकी भूमिका नेतृत्वकारी थी. इसी प्रयास का संगठित स्वरूप 1985 में जन संस्कृति मंच के रूप में सामने आया. गुरुशरण सिंह इस मंच के संस्थापक अध्यक्ष बने. उन्होंने चण्डीगढ़ में 25 व 26 अक्तूबर 1986 को मंच का पहला स्थापना समारोह आयोजित किया जो सत्ता के दमन और आतंकवाद के विरुद्ध सांस्कृतिक हस्तक्षेप था.

गुरुशरण सिंह क्रान्तिकारी राजनीतिक आंदोलनों से भी घनिष्ठ रूप से जुड़े थे. कहा जा सकता है कि इन्हीं आंदोलनों ने उनके वैचारिकी का निर्माण किया था. वामपंथ की क्रान्तिकारी धारा इण्डियन पीपुल्स फ्रंट से उनका गहरा लगाव था तथा उसके सलाहकार परिषद के सदस्य थे. भाकपा (माले) के कार्यक्रमों में वे गर्मजोशी के साथ शामिल होते थे. वे संस्कृति कर्म तक अपने को सीमित कर देने वाले कलाकार नहीं थे. इसके विपरीत उनकी समझ संस्कृति और राजनीति की अपनी विशिष्टता, सृजनात्मकता तथा स्वायतता पर आधारित उनके गहरे रिश्ते पर जोर देती है.

1980 के दशक में गुरुशरण सिंह ने सांस्कृतिक आंदोलन को संगठित करने के प्रयास में उत्तर प्रदेश, बिहार सहित कई राज्यों का दौरा किया. उनकी नाटक टीमें बिहार के पटना व भोजपुर के किसान आंदोलन के संघर्ष के इलाकों में गईं. किसान जनता के बीच नाटक किये. उत्तर प्रदेश के तराई के क्षेत्र जैसे पूरनपुर, पीलीभीत, बिन्दुखता, हल्द्वानी, काशीपुर में उनके नाट्य प्रदर्शन हुए. इसी क्रम में वे कई बार लखनऊ भी आये. उन्होंने लखनऊ के एवेरेडी फैक्ट्री गेट, उत्तर रेलवे के मंडल कार्यालय के प्रांगण व रेलवे इंस्टीच्यूट, जनपथ मार्केट सहित सड़को व नुक्कड़ों पर ‘गड्ढा’, ‘जंगीराम की हवेली’, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और फैज व जगमोहन जोशी के गीतों के द्वारा जो सांस्कृतिक लहर पैदा की, वह आज भी हमें याद है.  गुरुशरण सिंह सही मायने में जनता के सच्चे सांस्कृतिक योद्धा थे, ऐसा योद्धा जो हिन्दुस्तान की शक्ल बदलने का सपना देखता है, इंकलाब के लिए अपने को समर्पित करता है और अपनी ताकत शहीदों के विचारों व संघर्षों से तथा लोक संस्कृति से ग्रहण करता है. गुरुशरण सिंह अक्सरहाँ कहा करते थे ‘हमारी लोक संस्कृति की समृद्ध परम्परा नानक, गुरुगोविन्द सिंह और भगत सिंह की है. दुल्हा वट्टी एक मुसलमान वीर था जिसने मुसलमान शासकों के ही खिलाफ किसानों को संगठित किया था – हमारी लोकगाथाएँ यह है. आज के पंजाब और हमारे वतन हिन्दुस्तान को आशिक-माशूक के रूप में न देखा जाय, बल्कि आज के हिन्दुस्तान को, जालिम और मजलूम की शक्ल में देखा जाय, इंकलाब की शक्ल में देखा जाय.

http://www.janjwar.com/2011-06-03-11-27-26/78-literature/1961-2011-10-01-06-33-21

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